भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 468

उस विराट ने उत्क्रमण किया और वह सर्पों के समीप पहुंचा. सर्पों ने उस का आह्वान करते हुए कहा—"हे विषवाले आओ.” (१३) तस्यास्तक्षको वैशालेयो वत्स आसीदलाबुपात्रं पात्रम्.. (१४) वैशालेय तक्षक उस का वत्स और अलाबु उस का पात्र था. (१४) तां धृतराष्ट्र ऐरावतो ऽ धोक् तां विषमेवाधोक्.. (१५) ऐरावत संबंधी सर्प ने उस का दोहन किया और विष का दोहन किया. (१५) तद् विषं सर्पा उप जीवन्त्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद.. (१६) उस विष के सहारे सर्प जीवित रहते हैं. जो इस बात को जानता है, वह सब को जीवन का सहारा देने वाला बनता है. (१६) सूक्त-१० (६) देवता—विराट् तद् यस्मा एवं विदुषे ऽ लाबुनाभिषिञ्चेत् प्रत्याहन्यात्.. (१) जो इस को जानने वाले को अलाबु के द्वारा सींचता है, वह उस का हनन कर देता है. (१) न च प्रत्याहन्यान्मनसा त्वा प्रत्याहन्मीति प्रत्याहन्यात्.. (२) वैसे तो इस का हनन नहीं करता, पर जब मन से सोचता है कि उस का हनन करूं तो हनन कर देता है. (२) यत् प्रत्याहन्ति विषमेव तत् प्रत्याहन्ति.. (३) जो विषकारी विनाश करते हैं, वे ही विनाश करवाते हैं. (३) विषमेवास्याप्रियं भ्रातृव्यमनुविषिच्यते य एवं वेद.. (४) जो इस बात को जानता है, उस का विष ही प्रिय होता है. वह अपने भाई के पुत्र का ही सिंचन करता है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*