भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 470

विश्वरूप का उस की माता मधुकशा ने भरणपोषण किया. विश्वरूप ने उत्पन्न होते ही सारे संसार को मोहित कर दिया. (५) कस्तं प्र वेद क उ तं चिकेत यो अस्या हृदः कलशः सोमधानो अक्षितः. ब्रह्मा सुमेधाः सो अस्मिन् मदेत.. (६) उस विश्वरूप को कौन भलीभांति जानता है? उस का हृदय सोम को धारण करने के लिए कलश रूप में अक्ष अर्थात् विनाश रहित रहता है, इस का साक्षात्कार किस को है? शोभन बुद्धि वाले ब्रह्मा इस में आनंदित होते हैं. (६) स तौ प्र वेद स उ तौ चिकेत यावस्याः स्तनौ सहस्रधारावक्षितौ. ऊर्जं दुहाते अनपस्फुरन्तौ.. (७) उस के थन कभी दूध से शून्य न होने वाले एवं दूध की हजार धाराएं बहाने वाले हैं. ये थन सदैव दूध प्रदान करते रहते हैं. इन थनों को वही ब्रह्मा जानते हैं. (७) हिङ्करिक्रती बृहती वयोधा उच्चैर्घोषा ऽ भ्येति या व्रतम्. त्रीन् घर्मानभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः.. (८) शब्द करने वाली एवं दूध के रूप में हवि धारण करने वाली मधुकशा गौ रंभाती हुई कर्म क्षेत्र में आती है. वह गौ देवों का आश्रय प्राप्त करने वालों के शब्द को अपने दूध से सशक्त बनाती है. (८) यामापीनामुपसीदन्त्यापः शाक्वरा वृषभा ये स्वराजः. ते वर्षन्ति ते वर्षयन्ति तद्विदे काममूर्जमापः.. (९) मनोकामना की वर्षा करने वाले उज्ज्वल जल आते हैं, वे जल मधुकशा को जानने के लिए शक्ति देने वाले अन्न देते हैं एवं अभिलाषा पूर्ण करते हैं. (९) स्तनयित्नुस्ते वाक् प्रजापते वृषा शुष्मं क्षिपसि भूम्यामधि. अग्नेर्वातान्मधुकशा हि जज्ञे मरुतामुग्रा नप्तिः.. (१०) हे वर्षा करने वाले प्रजापति-पति! तुम्हारी वाणी बिजली के समान भड़कने वाली है. तुम सारी पृथ्वी पर जल को सींचते हो. मरुतों की उग्र पुत्री मधुकशा का जन्म अग्नि और वायु से हुआ है. (१०) यथा सोमः प्रातःसवने अश्विनोर्भवति प्रियः. एवा मे अश्विना वर्च आत्मनि ध्रियताम्.. (११) जिस प्रकार अश्विनीकुमारों को प्रातः सवन में सोमरस प्रिय लगता है, अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*

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