अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे कृषण! शलाका दान करने वाले को, शाला के स्वामी को, अग्नि के लिए, घूमनेफिरने वाले पुरुष के लिए तथा तुझे भी नमस्कार है. (१२) गोभ्यो अश्वेभ्यो नमो यच्छालायां विजायते. विजावति प्रजावति वि ते पाशांश्चृतामसि.. (१३) शाला में जन्म लेने वाली गायों और घोड़ों को नमस्कार है. हे विजावती और प्रजावती! हम तेरे बंधनों को खोलते हैं. (१३) अग्निमन्तश्छादयसि पुरुषान् पशुभिः सह. विजावति प्रजावति वि ते पाशांश्चृतामसि.. (१४) हे विजावती और प्रजावती! तुम अग्नि को, पुरुषों को और पशुओं को अपने में छिपा लेती हो. हम तुम्हारे फंदों को खोलते हैं. (१४) अन्तरा द्यां च पृथिवीं च यद् व्यचस्तेन शालां प्रति गृह्णामि त इमम्. यदन्तरिक्षं रजसो विमानं तत् कृण्वे ऽ हमुदरं शेवधिभ्यः तेन शालां प्रति गृह्णामि तस्मै.. (१५) द्यौ और पृथ्वी के मध्य जो विस्तृत आकाश हैं, उस के द्वारा हम तेरी इस शाला को ग्रहण करते हैं. अंतरिक्ष और पृथ्वी की जो रचना शक्ति है, वह तेरे उदर में स्थित है. (१५) ऊर्जस्वती पयस्वती पृथिव्यां निर्मिता मिता. विश्वान्नं बिभ्रती शाले मा हिंसीः प्रतिगृह्णतः.. (१६) हे शाला! तू शक्तिशालिनी एवं दुग्ध से पूर्ण है. तुझे पृथ्वी पर नापतोल कर बनाया गया है. तू सभी प्रकार का अन्न धारण करती है. जो तुझे ग्रहण करते हैं, तू उन का विनाश मत कर. (१६) तृणैरावृता पलदान् वसाना रात्रीव शाला जगत् निवेशनी. मिता पृथिव्यां तिष्ठसि हस्तिनीव पद्धती.. (१७) घासफूंस से ढकी हुई अर्थात् चटाइयों को धारण करती हुई शाला जगत् के प्राणियों को रात्रि के समान विश्राम देने वाली है. हे शाला! तू हथिनी के पैरों के चिह्नों के समान पृथ्वी पर स्थित है. (१७) इटस्य ते वि चृताम्यपिनद्धमपोर्णुवन्. वरुणेन समुब्जितां मित्रः प्रातर्व्युब्जतु.. (१८) हे शाला! मैं व्यतीत हुए संवत्सर के समान तेरे बंधनों को खोल कर अलग करता हूं. eBook converter DEMO Watermarks*