अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! जो इस यजमान के पशुओं एवं राष्ट्र का अपहरण करना चाहते हैं, तू उन के भाग्य और आयु को उन से छीन कर उन्हें नष्ट कर दे. (१६) यथा सूर्यो अतिभाति यथा ऽ स्मिन् तेज आहितम्. एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१७) जिस प्रकार यह सूर्य अत्यधिक प्रकाशित होता है और जिस प्रकार इस में तेज व्याप्त है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे कीर्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करे. यह मणि मुझे तेजस्वी और यशस्वी बनाए. (१७) यथा यशश्चन्द्रमस्यादित्ये च नृचक्षसि. एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१८) सभी मनुष्यों के साक्षी चंद्रमा में और सूर्य में जैसा यश व्याप्त है, यह वरण वृक्ष से निर्मित मणि उसी प्रकार मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१८) यथा यश: पृथिव्यां यथा ऽ स्मिन्जातवेदसि. एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (१९) पृथ्वी और अग्नि में जिस प्रकार यश प्रतिष्ठित है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि मुझे उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (१९) यथा यश: कन्यायां यथास्मिन्सम्भूते रथे. एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२०) कन्या में और भरे हुए रथ में जिस प्रकार यश व्याप्त है, वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि मुझे उसी प्रकार यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२०) यथा यश: सोमपीथे मधुपर्के यथा यश:. एवा मे वरणो मणि: कीर्तिं भूतिं नि यच्छतु तेजसा मा समुक्षतु यशसा समनक्तु मा.. (२१) जिस प्रकार सोमपीथ और मधुपर्क नामक यज्ञ क्रियाओं के करने से यश प्राप्त होता है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित मणि मुझे यश और ऐश्वर्य प्रदान करे. (२१) यथा यशोऽग्निहोत्रे वषट्कारे यथा यश:.