अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 556, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतान् वै त्रयस्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः.. (२७) जिस के शरीर के अवयवों में तैंतीस देवता अलगअलग निवास करते हैं, उन तैंतीस देवों को केवल वे ही जानते हैं जो ब्रह्म के ज्ञाता हैं. (२७) हिरण्यगर्भं परममनत्युद्यं जना विदुः. स्कम्भस्तदग्रे प्रासिञ्चद्धिरण्यं लोके अन्तरा.. (२८) लोग हिरण्यगर्भ को महान और श्रेष्ठ जानते हैं. परमात्मा ने ही इस संसार के मध्य उस हिरण्यगर्भ को बनाया था. (२८) स्कम्भे लोकाः स्कम्भे तपः स्कम्भे ऽ ध्यृतमाहितम्. स्कम्भं त्वा वेद प्रत्यक्षमिन्द्रे सर्वं समाहितम्.. (२९) उस परमात्मा में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे परमात्मा! मैं तुझे प्रत्यक्ष रूप से जानता हूं. इंद्र में ही यह सब समाया हुआ है. (२९) इन्द्रे लोका इन्द्रे तप इन्द्रे ऽ ध्यृतमाहितम्. इन्द्रं त्वा वेद प्रत्यक्षं स्कम्भे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (३०) इंद्र में समस्त लोक, तप और ऋत अर्थात् सत्य समाया हुआ है. हे इंद्र! मैं तुझे प्रत्यक्ष रूप से जानता हूं. परमात्मा में ही यह सब समाया हुआ है. (३०) नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषसः. यदजः प्रथमं संबभूव स ह तत् स्वराज्यमियाय यस्मान्नान्यत् परमस्ति भूतम्.. (३१) सूर्योदय से पूर्व एवं उषा काल से पूर्व श्रद्धालु जन नाम के द्वारा नाम का हवन करते हैं अर्थात् परमात्मा के नाम के द्वारा उस के महत्त्व का वर्णन करते हैं. इस प्रकार प्रयत्नशील जो अजन्मा आत्मा अर्थात् भक्त परमात्मा के साथ संयोग प्राप्त करता है, वह स्वराज्य को प्राप्त करता है अर्थात् जन्ममरण के बंधन से मुक्ति पा जाता है. उस परमात्मा की अपेक्षा कोई तत्त्व श्रेष्ठ नहीं है. (३१) यस्य भूमिः प्रमा ऽ न्तरिक्षमुतोदरम्. दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (३२) धरती जिस के पैरों का नाम है, अंतरिक्ष जिस का उदर है तथा जिस ने स्वर्ग को अपना शीश बनाया है, उस ज्येष्ठ ब्रह्म को मेरा नमस्कार है. (३२) यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः. ebook converter DEMO Watermarks*