भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 576

ग्यारहवां कांड सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन अग्ने जायस्वादिर्तिनाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा. सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह.. (१) हे अग्नि देव! तुम अरणि मंथन से उत्पन्न हुए हो. यह देव माता अदिति पुत्र की कामना से इस ब्रह्मौदनासव नामक कर्म में ब्राह्मणों को खिलाने के हेतु भात पकाना चाहती है. मरीच आदि सप्त ऋषि पृथ्वी आदि को बनाने वाले हैं. वे इस देवयज्ञ में मंथन के द्वारा तुम्हें यजमान के पुत्र, पौत्र आदि के साथ उत्पन्न करें. (१) कृणुत धूमं वृषणः सखायोऽद्रोघाविता वाचमच्छ. अयम्अग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवा असहन्त दस्यून्.. (२) हे कामना पूर्ण करने वाले एवं जगत् के मित्र सप्त ऋषियो! तुम अरणि मंथन के द्वारा धुआं उत्पन्न करो. ये अग्नि देव स्तुति रूपी ऋचाएं सुन कर उत्तम चरित्र वाले यजमानों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं. देवों सहित ये अग्नि देवशत्रु सेनाओं को पराजित करते हैं. अग्नि की सहायता से देवों ने राक्षसों को पराजित किया था. (२) अग्ने ऽ जनिष्ठा महते वीर्याय ब्रह्मौदनाय पक्तवे जातवेदः. सप्त ऽ ऋषयो भूतकृतस्ते त्वा ऽ जीजनन्नस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (३) हे उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव! तुम परम सामर्थ्य के लिए अरणि मंथन से उत्पन्न होते हो. पृथ्वी आदि की रचना करने वाले सप्त ऋषियों ने तुम्हें ब्रह्मौदन पकाने के लिए उत्पन्न किया था. तुम इस पत्नी को पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३) समिद्धो अग्ने समिधा सामिध्यस्व विद्वान् देवान् यज्ञियाँ एह वक्षः. तेभ्यो हविः श्रपयं जातवेद उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् .. (४) हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४) त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्. ebook converter DEMO Watermarks*