भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 579

अयं यज्ञो गातुविन्नाथवित् प्रजाविदुग्रः पशुविद् वीरविद् वो अस्तु.. (१५) हे जलो! तुम्हारा जो बलकारक अंश ब्रह्मा ने बनाया था, वही इस यज्ञ में लाया जाता है. हे पत्नी! ये जल मंत्रों एवं ब्रह्मा के द्वारा अनुमति प्राप्त हैं. इन्हें तू घड़े में भर. यह तैयार किया जाता हुआ ब्रह्मौदनासव नामक यज्ञ तेरे लिए स्वर्ग के मार्ग को प्राप्त कराने वाला, चाहे गए स्वर्ग आदि फल को देने वाला, पुत्र, पौत्रों का दाता, गाय, घोड़े आदि पशुओं को प्राप्त कराने वाला एवं अनेक सेवकों को प्रदान करने वाला हो. (१५) अग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वाध्यरुक्षच्छुचिस्तपिष्ठस्तपसा तपैैनम्. आर्षेया दैवा अभिसङ्गत्त्य भागमिमं तपिष्ठा ऋतुभिस्तपन्तु.. (१६) हे अग्नि! यज्ञ के योग्य चरु अर्थात् हवि पकाने की बटलोई तुम्हारे ऊपर स्थित हो. तुम अपने तेज से इस शुद्ध एवं तपी हुई बटलोई को अधिक तपाओ. गोत्र प्रवर्तक ऋषियों को जानने वाले ब्राह्मण एवं इंद्रादि देव अपनाअपना भाग पा कर इस बटलोई से संतुष्ट हों और इसे अधिक तपाएं. (१६) शुद्धाः पूता योषितो यज्ञिया इमा आपश्चरुमव सर्पन्तु शुभ्राः. अदुः प्रजां बहुलान् पशून् नः पक्तौदनस्य सुकृतामेतु लोकम्.. (१७) शुद्ध और पवित्र स्त्रियां यज्ञ के योग्य इन श्वेत रंग के जलों को बटलोई में डालें. वे जल हमें पुत्र आदि रूप संतान और गाय, भैंस आदि पशु प्रदान करें. ब्रह्मौदन को पकाने वाला यजमान पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को जाए. (१७) ब्रह्मणा शुद्धा उत पूता घृतेन सोमस्यांशवस्तण्डुला यज्ञिया इमे. अपः प्र विशत प्रति गृह्णातु वश्चरुरिमं पक्त्वा सुकृतामेत लोकम्.. (१८) ये चावल मंत्र के द्वारा शुद्ध तथा जल के द्वारा धोए गए एवं अमृत के अंश हैं. यज्ञ के योग्य ये चावल बटलोई में भरे हुए जल में प्रवेश करें. हे चावल! बटलोई तुम्हें स्वीकार करे. यजमान इस ब्रह्मौदन को पका कर पुण्य करने वालों के लोक अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त हो. (१८) उरुः प्रथस्व महता महिम्ना सहस्रपृष्ठः सुकृतस्य लोके. पितामहाः पितरः प्रजोपजा ऽ हं पक्ता पञ्चदशस्ते अस्मि.. (१९) हे भात! तू पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में अतिशय विस्तीर्ण हो और हजारों अवयवों वाला बन कर फैल. हमारे पिता, पितामह आदि सात पुरुष तेरे द्वारा तृप्त हों एवं हमारे पुत्र, पौत्र आदि सात पीढ़ियां तेरे द्वारा प्रसन्न हों. ब्रह्मौदन को पकाने वाला मैं तेरे लिए पंद्रहवां हूं. (१९) सहस्रपृष्ठः शतधारो अक्षतो ब्रह्मौदनो देवयानः स्वर्गः. ebook converter DEMO Watermarks*

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