भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 587

हे रुद्र! हमारी गायों, पुत्र, भृत्य आदि को मारने की इच्छा मत करो. हमारी बकरियों एवं भेड़ों की हिंसा करने की बात मत सोचो. हे शक्तिशाली रुद्र! अपना आयुध हमें छोड़ कर अन्यत्र चलाओ तथा देव हिंसकों की संतान का वध करो. (२१) यस्य तक्मा कासिका हेतिरेकमश्वस्येव वृषणः क्रन्द एति. अभिपूर्वं निर्णयते नमो अस्त्वस्मै.. (२२) ज्वर एवं खांसी जिन रुद्र के आयुध हैं, वे गर्भाधान में समर्थ घोड़े के समान शब्द करते हुए अपकारी पुरुष के पास जाते हैं. रुद्र के वे आयुध अपराधी के अपराध का विचार कर के क्रम से नाश करते हैं. ऐसे रुद्र को मेरा नमस्कार है. (२२) यो ३ न्तरिक्षे तिष्ठति विष्टभितो ऽ यज्वनः प्रमृणन् देवीपीयून्. तस्मै नमो दशभिः शक्वरीभिः.. (२३) जो रुद्र अंतरिक्ष में स्थित हो कर यज्ञ न करने वालों एवं देव हिंसकों की हत्या करते हैं, उन के लिए मेरा हाथ जोड़ कर नमस्कार है. (२३) तुभ्यमारण्याः पशवो मृगा वने हिता हंसाः सुपर्णाः शकुना वयांसि. तव यक्षं पशुपते अप्स्व १ न्तस्तुभ्यं क्षरन्ति दिव्या आपो वृधे.. (२४) हे पशुपति! वन में जन्म लेने वाले हरिण, सिंह आदि पशु एवं हंस आदि नर पक्षी तुम्हारे लिए बनाए गए हैं. तुम उन्हीं को स्वीकार करो और हमारे पशुओं का वध मत करो. तुम्हारा पूज्य स्वरूप जलों के भीतर वर्तमान है, इसलिए तुम्हारे स्नान के हेतु दिव्य जल बहते हैं. तुम हमारे उपयोग के जल को मत छुओ. (२४) शिंशुमारा अजगराः पुरीकया जषा मत्स्या रजसा येभ्यो अस्यसि. न ते दूरं न परिष्ठास्ति ते भव सद्यः सर्वान् परि पश्यसि भूमिं पूर्वस्माद्धंस्युत्तरस्मिन् त्समुद्रे.. (२५) हे रुद्र! मगर, अजगर, झष, मत्स्य आदि जलचर तुम्हारे हेतु हैं, जिन की ओर तुम अपने तेज से आयुध चलाते हो. तुम सारी भूमि को एक क्षण में ही देख लेते हो और पूर्व दिशा में वर्तमान सागर से उत्तर दिशा में स्थित सागर तक एक क्षण में ही पहुंच जाते हो. (२५) मा नो रुद्र तक्मना मा विषेण मा नः सं स्रा दिव्येनाग्निना. अन्यत्रास्मद् विद्युतं पातयैताम्.. (२६) हे रुद्र! ज्वर के द्वारा, विष के द्वारा एवं बिजली रूपी दिव्य तेज के द्वारा हमारा स्पर्श मत करो. तुम अपने प्रकाश युक्त आयुध को हमें छोड़ कर अन्यत्र गिराओ. (२६) भवो दिवो भव ईशे पृथिव्या भव आ पप्र उर्व १ न्तरिक्षम्. ebook converter DEMO Watermarks*