अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयुक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है इस विधि से जो इस ओदन का सेवन करना जानता है वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर है. (१८) सूक्त-६ देवता—प्राण प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे. यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१) इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत् है. यह प्राण सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत् स्थित है. (१) नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे. नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्षते.. (२) हे ध्वनि करते हुए प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार है, मेघ घटा में घुस कर वर्षा करने वाले तुम्हारे लिए नमस्कार है. बिजली के रूप में प्रकाशित एवं वर्षा करते हुए तुम्हें नमस्कार है. (२) यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्योषधी:. प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते.. (३) जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से उत्पन्न होती हैं. (३) यत् प्राण ऋतावागते ऽ भिक्रन्दत्योषधी:. सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्यामधि.. (४) जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा ऋतु आने पर फसलों को लक्ष्य कर के गर्जन करते हैं, तब भूमि पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब प्रसन्न होते हैं. (४) यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्. पशवस्तत् प्र मोदन्ते महो वै नो भविष्यति.. (५) जिस समय प्राण अर्थात् सूर्य देव, पृथ्वी को वर्षा के जल से सभी ओर गीला कर देते हैं, उस समय गाय आदि पशु प्रसन्न होते हैं कि घास की अधिकता से हमारे लिए उत्सव होगा. (५) अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन्. आयुर्वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीरकः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*