अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे प्राण! यह कहा हुआ तुम्हारा माहात्म्य जो जानता है एवं जिस विद्वान् में तुम प्रतिष्ठित रहते हो, उस के लिए सभी देव स्वर्ग में अमृतमय भाग प्रस्तुत करते हैं. (१८) यथा प्राण बलिहृतस्तुभ्यं सर्वाः प्रजा इमाः. एवा तस्मै बलिं हरान् यस्त्वा शृणवत् सुश्रवः.. (१९) हे प्राण! जिस प्रकार ये सभी प्रजाएं तुम्हारे लिए बलि प्रस्तुत करें. हे सुनने वाले प्राण! जो तुम्हारा माहात्म्य सुनता है, उस के लिए भी सब बलि प्रस्तुत कर देते हैं. (१९) अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुन:. स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः.. (२०) प्राण गर्भ हो कर देवताओं में विचरण करता है, वही भलीभांति व्याप्त हो कर मनुष्य आदि के शरीर के रूप में पुनः उत्पन्न होता है. नित्य वर्तमान वह प्राण भूतकाल की वस्तुओं में तथा भविष्य काल की वस्तुओं के रूप में उत्पन्न होता है. वही अपनी शक्तियों से पिता और पुत्र में प्रवेश करता है. (२०) एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्. यदङ्ग स तमुत्खिदेन्रैवाद्य न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन.. (२१) हंस अर्थात् जगत् के प्राण बने हुए सूर्य जल से उदित होते हुए अपने एक चरण अर्थात् भाग को जल से ऊपर नहीं उठाते हैं. यदि वे अपने दूसरे चरण को भी ऊपर उठा लें तो काल विभाजन नहीं हो सकेगा. तब वे कहीं न जा सकेंगे और न दिन और रात हो सकेंगे. (२१) अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा. अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (२२) त्वचा, रक्त आदि आठ धातुएं शरीर का निर्माण करती हैं. उन्हीं का यहां रथ के पहियों के रूप में निरूपण है—यह शरीर आठ पहियों वाला रथ है. प्राण ही इस की एकमात्र धुरी है. लोक में रथ के पहिए धुरी को घेरे रहते हैं. प्राण रूपी धुरी एक पहिए से निकल कर दूसरे में प्रवेश करती है. वह प्राण अपने एक अंश से सारे प्राणियों में प्रवेश कर के आत्मा के रूप में उत्पन्न होता है. उस का दूसरा भाग असीमित ब्रह्म का झंडा अर्थात् ब्रह्मांड बन जाता है. (२२) यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः. अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमो ऽ स्तु ते.. (२३) जो प्राण नाना रूपों को जन्म देने वाला है, जो इस संसार का स्वामी है तथा नाना प्राणियों के शरीरों में व्याप्त है, उस तीव्रता से व्याप्त होने वाले हे प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार ebook converter DEMO Watermarks*