भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 606

आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः. तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः.. (३) आचार्य ब्रह्मचारी का उपनयन अर्थात् यज्ञोपवीत संस्कार कर के अपने समीप रखता हुआ उसे विद्या से संपन्न करता है. आचार्य उस ब्रह्मचारी को तीन रात्रियों तक अपने अत्यधिक समीप रखता है. चौथे दिन विद्यामय शरीर से उत्पन्न उस ब्रह्मचारी को देखने के लिए देवगण एकत्र हो कर आते हैं. (३) इयं समित् पृथिवी द्यौर्द्वितीयेातान्तरिक्षं समिधा पृणाति. ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति.. (४) यह पृथ्‍वी ब्रह्मचारी की पहली समिधा है. द्युलोक अर्थात् स्वर्ग ब्रह्मचारी की दूसरी समिधा है. ब्रह्मचारी स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष को अग्नि में डाली गई समिधा के द्वारा पूर्ण करता है. इस प्रकार ब्रह्मचारी समिधा, मेखला, श्रम और तप के द्वारा लोकों को पूर्ण करता है अर्थात् भर देता है. (४) पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्. तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (५) सर्व जगत् के कारण ब्रह्म से सब से पहले ब्रह्मचारी उत्पन्न हुआ. उत्पन्न हुआ ब्रह्मचारी धर्म से अपनेआप को ढकता हुआ तप के द्वारा उठा. उस ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म से ब्राह्मणों का धन वेद उत्पन्न हुआ. उस वेद से अमृत के साथ अग्नि आदि देव उत्पन्न हुए. (५) ब्रह्मचर्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः. स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्संगृह्य मुहुराचरिक्रत्.. (६) समिधा से उत्पन्न तेज को धारण करता हुआ, नियमों के द्वारा वश में किया गया, लंबी दाढ़ी वाला ब्रह्मचारी पूर्व सागर से उत्तर सागर की ओर गया. उस ने पृथ्वी, अंतरिक्ष आदि लोकों को वश में कर के अपने अभिमुख किया. (६) ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्. गर्भो भूत्वा मृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वा ऽ सुरांस्ततर्ह.. (७) उस ब्रह्मचारी ने ब्राह्मण जाति के जल अर्थात् गंगा आदि नदियों को, स्वर्ग आदि लोकों को, प्रजाओं की सृष्टि करने वाले प्रजापति को तथा प्रजापति के बाद सृष्टि की रचना करने वाले परमेष्ठी को उत्पन्न किया. वह ब्रह्मचारी मृत्यु रहित ब्रह्म की सत्ता, रज, तमोगुण वाली प्रकृति में गर्भ बन कर सब को जन्म देता है. उस ने तप के बल से इंद्र हो कर देवों के विरोधी असुरों का विनाश किया. (७) आचार्य स्ततक्ष नभसी उभे इमे उर्वी गम्भीरे पृथिवीं दिवं च. ebook converter DEMO Watermarks*