भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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बारहवां कांड सूक्त-१ देवता—भूमि सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति. सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु.. (१) पृथ्वी को धारण करने वाले ब्रह्म, तप, यज्ञदीक्षा तथा विशाल रूप में फैले हुए जल हैं. इस पृथ्वी ने भूत काल के जीवों का पालन किया था और भविष्य काल के जीवों का भी पालन करेगी. इस प्रकार की पृथ्वी हमें निवास के हेतु विस्तृत स्थान प्रदान करे. (१) असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु. नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः.. (२) जिस भूमि पर ऊंचे, नीचे तथा समतल स्थान हैं तथा जो अनेक प्रकार की सामर्थ्य वाली जड़ीबूटियों को धारण करती है, वह भूमि हमें सभी प्रकार तथा पूर्ण रूप से प्राप्त हो और हमारी सभी कामनाओं को पूर्ण करे. (२) यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु.. (३) यह पृथ्वी सागरों, नदियों, झरनों और सरोवरों के जल से सुशोभित है. इस पृथ्वी पर कृषि की जाती है, जिस से अन्न उत्पन्न होता है. उस अन्न से संसार के प्राणवान मनुष्य, पशु आदि तृप्ति पाते हैं. इस प्रकार की पृथ्वी हमें उस प्रदेश में प्रतिष्ठित करे, जहां पर रसदार फल उत्पन्न होते हैं. (३) यस्याश्चतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः. या बिभर्ति बहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गोष्वप्यन्ने दधातु.. (४) जिस पृथ्वी पर चार दिशाएं हैं, जिस पर अन्न उत्पन्न होता है और जिस पर किसान खेती करते हैं तथा जो सांस लेने वाले एवं गतिशील प्राणियों को धारण करती है, वह पृथ्वी हमारे लिए दुधारू गाएं और अन्न धारण करे. (४) यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्. गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु.. (५)