अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 695, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंउभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित्.. (३०) हे सूर्य देव! तुम स्वर्ग में, अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर तथा जल में दमकते हो. तुम अपने तेज से पूर्व और पश्चिम सागरों को व्याप्त कर लेते हो. (३०) अर्वाङ् परस्तात् प्रयतो व्यध्व आशुर्विपश्चित् पतयन् पतङ्गः. विष्णुर्विचित्तः शवसाधितिष्ठन् प्र केतुना सहते विश्वमेजत्.. (३१) दक्षिण की ओर जाते हुए सूर्य अपना मार्ग शीघ्र ही पूरा कर लेते हैं. ये व्यापक देव परम ज्ञानी हैं. ये अपनी शक्ति से अधिष्ठित होते हैं. ये अपने ज्ञान के बल से समस्त विश्व को अपने वश में कर लेते हैं. (३१) चित्रश्चिकित्वान् महिषः सुपर्ण आरोचयन् रोदसी अन्तरिक्षम्. अहोरात्रे परि सूर्यं वसाने प्रास्य विश्वा तिरतो वीर्याणि.. (३२) महिमामय सूर्य ज्ञानवान एवं पूज्य हैं. सूर्य देव शोभन मार्ग से गमन करते हैं. सूर्य देव आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को दमकाते हुए दिवस और रात्रि को आश्रय देते हैं. सूर्य देव के बल से ही सब पार होते हैं. (३२) तिग्मो विभ्राजन् तन्वं १ शिशानो ऽ रंगमासः प्रवतो रराणः. ज्योतिष्मान् पक्षी महिषो वयोधा विश्वा आस्थात् प्रदिशः कल्पमानः.. (३३) सूर्य देव अपनी किरणें दमकाते हुए अपने शरीर को तपाते हैं. ये सुंदर गति वाले, ज्योतिमान, महिमाशाली तथा अन्न को पुष्ट करने वाले हैं. (३३) चित्रं देवानां केतुरनीकं ज्योतिष्मान् प्रदिशः सूर्य उद्यन्. दिवाकरो ऽ ति द्युम्नैस्तमांसि विश्वातारीद् दुरितानि शुक्रः.. (३४) देवताओं की ध्वजा रूप सूर्य सब के दर्शनीय हैं. ये उदय हो कर दिशाओं को प्रकाशित करते हैं तथा सभी प्रकार के अंधकार को मिटाते हुए अपने प्रकाश से दिन को प्रकट करते हैं. सूर्य देव पापों को दूर करते हैं. (३४) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्राद् द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३५) रश्मियों का प्रशंसनीय समूह मित्रावरुण के चक्षु के समान है. सूर्य देव भी प्राणियों के आत्मा रूप हैं. सभी प्राणियों में प्रवेश करने वाले सूर्य, आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी को व्याप्त किए हुए हैं. (३५) ebook converter DEMO Watermarks*