अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 698, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं, उन क्रोधपूर्ण सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है अथवा कष्ट देता है, हे रोहित देव! तुम उस को कंपित करो तथा उसे क्षीण करते हुए बंधन में डाल दो. (१) यस्माद् वाता ऋतुथा पवन्ते यस्मात् समुद्रा अधि विक्षरन्ति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२) जिस देवता के प्रभाव से वायु ऋतुओं के अनुसार चलती है तथा समुद्र प्रभावित होते हैं, क्रोध में भरे हुए सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, हे रोहित देव! उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए क्षीण करो और बंधन में डाल दो. (२) यो मारयति प्राणयति यस्मात् प्राणन्ति भुवनानि विश्वा. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (३) जो मनुष्य में प्राण भरते हैं, जो मनुष्य की हिंसा करते हैं, उन के द्वारा सभी प्राणी श्वास लेते और प्रश्वास के रूप में छोड़ते हैं, क्रोध में भरे उस देवता का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए हे रोहित देव! क्षीण करो एवं बंधन में डालो. (३) यः प्राणेन द्यावापृथिवी तर्पयत्यपानेन समुद्रस्य जठरं यः पिपर्ति. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (४) जो देवता प्राण, आकाश और पृथ्वी को तृप्त करता है तथा अपमान से समुद्र के पेट को पालता है, क्रोध में भरे उस के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव कंपित करते हुए क्षीण बनाओ एवं बंधन में डालो. (४) यस्मिन् विराट् परमेष्ठी प्रजापतिरग्निर्वैश्वानरः सह पङ्क्त्या श्रितः. यः परस्य प्राणं परमस्य तेज आददे. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (५) जिस में विराट् परमेष्ठी वैश्वानर पंक्ति, प्रजा और अग्नि सहित निवास करते हैं, जिस ने उत्कृष्ट प्राण के महान तेज को धारण किया है, उन क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण करो तथा अपने बंधन में बांध लो. (५) eBook converter DEMO Watermarks*