अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंउद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१०) हे कश्यप! तुम्हारे रोचमान चित्रभानु में सात सूर्य एक साथ रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१०) बृहदेनमनु वस्ते पुरस्ताद् रथन्तरं प्रति गृह्णाति पश्चात्. ज्योतिर्वसाने सदमप्रमादम्. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (११) जिस के अनुकूल रह कर बृहत् आच्छादन करता और रथंतर उसे धारण करता है, वे दोनों ही जातियों से सदैव ढके रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ अपने पाशों से बांध दो. (११) बृहदन्यतः पक्ष आसीद् रथन्तरमन्यतः सबले सध्रीची. यद् रोहितमजनयन्त देवाः. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१२) देवताओं द्वारा रोहित को उत्पन्न करने के समय बृहत् एक ओर तथा रथंतर दूसरी ओर हुए. ये दोनों ही शक्तिशाली और साथ रहने वाले पक्ष हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने बंधन में बांध लो. (१२) स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन्. स सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम्. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१३) वे वरुण देव सायं समय अग्नि होते हैं और प्रातःकाल उदित होते हुए मित्र बन जाते हैं. वे सविता के रूप से अंतरिक्ष में तथा इंद्र के रूप में स्वर्ग में स्थित रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव का जो अपराध करता है और विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उसे हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (१३) सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्. स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा. तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति. उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*