अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 805, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीच में पीलुमती नाम का द्युलोक है, जिस में नक्षत्र आदि रहते हैं. सब से ऊपर तीसरा प्रद्यौ नाम का द्युलोक है, जिस के इसी तीसरे भाग में पितर निवास करते हैं. (४८) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्. य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम.. (४९) हमारे पिता के जन्मदाता पितर, पितामह के जन्मदाता पितर, वे पितर जो विशाल अंतरिक्ष में प्रविष्ट हुए हैं तथा जो पितर स्वर्ग अथवा पृथ्वी पर निवास करते हैं, हम इन सभी लोकों में निवास करने वाले पितरों का नमस्कारों के द्वारा पूजन करते हैं. (४९) इदमद् वा उ नापरं दिवि पश्यसि सूर्यम्. माता पुत्रं यथा सिचाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५०) हे मृतक! हम श्राद्ध आदि में जो कुछ देते हैं, वही तेरा जीवन है. तेरे जीवन का अन्य कोई साधन नहीं है. इस श्मशान को प्राप्त हुआ तू सूर्य के दर्शन करता है. हे पृथ्वी! जिस प्रकार माता अपने पुत्र को आंचल से ढकती है. उसी प्रकार तुम इस मृतक को अपने तेज से ढक लो. (५०) इदमद् वा उ नापरं जरस्यन्यदितो ऽ परम्. जाया पतिमिव वाससाभ्ये नं भूम ऊर्णुहि.. (५१) जीर्ण होते हुए इस शरीर ने जो भोजन किया था, उस के अतिरिक्त इस के लिए कुछ भी अनुकूल नहीं है. इस के लिए इस श्मशान के अतिरिक्त कोई अन्य स्थान भी नहीं है. हे भूमि! श्मशान को प्राप्त हुए पितर को तुम उसी प्रकार ढक लो, जिस प्रकार पत्नी वस्त्र से अपने पति को ढकती है. (५१) अभि त्वोर्णोमि पृथिव्या मातुरुस्त्रेण भद्रया. जीवेषु भद्रं तन्मयि स्वधा पितृषु सा त्वयि. (५२) हे मृतक! सब की मंगलमयी माता पृथ्वी के वस्त्र से मैं तुझे ढकता हूं. जीवित अवस्था में दान करने के लिए जो सुंदर वस्तु प्राणी के पास होती है, वह मुझ संस्कार करने वाले के पास हो. स्वधाकार जो अन्न पितरों में होता है, वह तुझ में हो. (५२) अग्नीषोमा पथिकृता स्योनं देवेभ्यो रत्नं दधथुर्वि लोकम्. उप प्रेष्यन्तं पूषणं यो वहात्यज्ज्योयानैः पथिभिस्तत्र गच्छतम्.. (५३) हे अग्नि एवं सोम! तुम पुण्यलोक के मार्ग का निर्माण करते हो. तुम ने सुख देने वाले स्वर्गलोक की रचना की है. जो लोक सूर्य को अपने में धारण करता है, इस प्रेत को सरल मार्गों द्वारा उस लोक में पहुंचाओ. (५३) ebook converter DEMO Watermarks*