अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 838, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा वाडवाग्नि रूप से जलों में वर्तमान है, दावाग्नि रूप से वनों में विद्यमान है, जो ओषधियों में फल के पकने का कारण बनती है, जो सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में स्थित है तथा जो विद्युत के रूप में बादलों में रहती है, इन सब को एकत्र कर के नित्य धनदाता के रूप में आओ. (२) यस्ते देवेषु महिमा स्वर्गो या ते तनूः पितृष्वाविवेश. पुष्टिया॑ ते मनुष्येषु पप्रथे ऽ ग्ने तया रयिमस्मासु धेहि.. (३) हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा स्वर्गगामी के रूप में देवों में है, तुम्हारा जो नाम का हवि स्वधा के रूप में पितृलोक जाने वाला है तथा मनुष्य, पशु आदि चराचर में तुम्हारी जो पुष्टि है, अपने उन सभी रूपों के द्वारा हमें धन दो. (३) श्रुत्कर्णाय कवये वेद्याय वचोभिर्वाकैरुप यामि रातिम्. यतो भयमभयं तन्नो अस्तव देवानां यज हेडो अग्ने.. (४) हे अग्नि देव! तुम हमारे स्तोत्रों को सुनने में समर्थ करने वाले, मनचाहा फल देने वाले एवं सब के द्वारा जानने योग्य हो. मैं मंत्र रूप वाक्यों, अनुवाकों तथा सूक्तों से तुम्हारी स्तुति करता हूं, जिस से मुझे अभय प्राप्त हो, जो देव हमारे प्रति क्रोध करते हों, तुम उन का क्रोध शांत करो. (४) सूक्त-४ देवता—अग्नि यामाहुतिं प्रथमामथर्वा या जाता या हव्यमकृणोज्जातवेदाः. तां त एतां प्रथमो जोहवीमि ताभिष्टुप्तो वहतु हव्यमग्निरग्नये स्वाहा.. (१) हे अग्नि! अथर्वा रूप परमात्मा ने सृष्टि से पूर्व अपने द्वारा रचे हुए देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तुम में जो आहुति दी थी और तुम ने उस आहुति को देवगण तक पहुंचने योग्य बनाया, हे अग्नि! मैं सब यजमानों से पहले उस आहुति को तुम्हारे मुख में डालता हूं. हवि प्राप्त कराने वाले दूत रूप, देवता रूप एवं हवि प्रक्षेप के आधार रूप तीन रूपों से स्तुति किए गए अग्नि मेरा यह हवि देवों को प्राप्त कराएं. (१) आकूतिं देवीं सुभगां पुरो दधे चित्तस्य माता सुहवा नो अस्तु. यामाशामेमि केवली सा मे अस्तु विदेयमेनां मनसि प्रविष्टाम्.. (२) मैं तात्पर्य रूप, प्रकाशित होने वाली एवं शोभन भाग्य से युक्त वाणी अर्थात् सरस्वती की सेवा करता हूं. पुत्र जिस प्रकार माता के वश में होता है, उसी प्रकार मेरे मन को वश में रखती हुई हमारे आह्वान से हमारे अनुकूल हो. मैं जो कामना करता हूं, वह केवल मेरी हो, किसी अन्य को प्राप्त न हो. मैं अपनी कामना को सदा प्राप्त करूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*