अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 840, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंतावन्तो अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पूरुषः. पादो ऽ स्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि.. (३) जितनी इस नारायण नाम के पुरुष की महिमाएं हैं, ये उन से भी अधिक महान हैं. इस का एकमात्र अर्थात् चौथा अंश सभी प्राणियों में व्याप्त है. इस के तीन चरण अर्थात् मात्र मरण रहित होते हुए स्वर्गलोक में वर्तमान हैं. (३) पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्. उतामृतत्वस्येश्वरो यदन्नेनाभवत् सह.. (४) जो अतीत जगत्, भविष्य में होने वाला जगत् और यह दृश्यमान जगत् है, वह सब पुरुष ही है. यह पुरुष मरण रहित देवों का भी स्वामी है तथा जो भोग्य अन्न के साथ हुए यह उन का भी ईश्वर है. (४) यत् पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्. मुखं किमस्य किं बाहु किमूरू पादा उच्येते.. (५) साध्य और वसु नाम के देवताओं ने जब यज्ञ पुरुष की कल्पना की, तब उन्होंने यह कल्पना कितने प्रकार से की थी. इस का मुख क्या था, इस की भुजाएं क्या थीं और इस के चरण क्या कहलाते थे. (५) ब्राह्मणो ऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यो ऽ भवत्. मध्यं तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत.. (६) इस यज्ञात्मा पुरुष का मुख ब्राह्मण था. इस की भुजाओं क्षत्रिय हुए. इस का जो मध्य भाग था, उससे वैश्य जाति के पुरुष हुए और इस के दोनों चरणों से शुद्र की उत्पत्ति हुई. (६) चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत. मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत.. (७) इस यज्ञ रूप पुरुष के मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ और नयनों से सूर्य की उत्पत्ति हुई. इस के मुख से इंद्र और अग्नि देव तथा प्राण से अग्नि की उत्पत्ति हुई. (७) नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत. पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकाँ अकल्पयन्.. (८) इस यज्ञ पुरुष की नाभि से अंतरिक्ष लोक, शीश से स्वर्गलोक, चरणों से भूमि तथा कानों से दिशाएं उत्पन्न हुईं. इस प्रकार साध्य और वसु नाम के देवों ने लोकों की कल्पना की, लोकों का निर्माण किया. (८) ebook converter DEMO Watermarks*