अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वजों ने जो यज्ञ, कुआं एवं बाग से संबंधित उत्तम कर्म किए हैं, वे शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. हम अपकार करने वाले शत्रु को जादू टोने रूपी देवता के क्रोध के द्वारा अपने वश में करते हैं. (४) द्यावापृथिवी अनु मा दीधीथां विश्वे देवासो अनु मा रभध्वम्. अङ्गिरसः पितरः सोम्यासः पापमार्थत्वपकामस्य कर्ता (५) हे द्यावा पृथ्वी! तुम शत्रु को जीतने में मेरे अनुकूल बनो. हे समस्त देवो! तुम मेरे शत्रु को पकड़ने के लिए तैयार हो जाओ. हे सोमरस के पात्र अंगिरा गोत्रीय ऋषियो एवं पितरो! तुम ऐसा प्रयत्न करो कि मुझ से द्रोह करने वाले शत्रु मृत्यु को प्राप्त हों. (५) अतीव यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यो निन्दिषत् क्रियमाणम्. तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषं द्यौरभिसंतपाति.. (६) हे मरुतो! जो शत्रु अपनेआप को हम से अधिक शक्तिशाली मानता है अथवा जो हमारे द्वारा किए जाने वाले मंत्र संबंधी कर्म की निंदा करता है, उस के लिए संतापकारी आयुध बाधक हों. मेरे कर्म से द्वेष करने वाले को द्यौ संताप दे. (६) सप्त प्राणानष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा. अया यमस्य सादनमग्निदूतो अरङ्कृतः.. (७) हे शत्रु! तेरे सात प्राणों अर्थात् आंख, नाक, कान और मुंह के सात छिद्रों को तथा तेरे कंठ की आठ धमनियों को मैं अपने मंत्र संबंधी अभिचार कर्म के द्वारा काटता हूं. छिन्न अंगों वाला तू यमराज के घर जा. तेरे जलाने के लिए अग्नि दूत के समान आ गई है. इस के बाद तेरे शव को सजाया जाएगा. (७) आ दधामि ते पदं समिद्धे जातवेदसि. अग्निः शरीरं वेवेष्ट्वसुं वागपि गच्छतु.. (८) हे शत्रु! मैं जलती हुई अग्नि में तेरे कटे हुए चरणों के साथ तेरे पैरों की धूल फेंकता हूं. अग्नि तेरे शरीर में प्रवेश कर के तेरे सारे अंगों में फैल जाए. तेरी वाणी और प्राण भी समाप्त हो जाएं. (८) सूक्त-१३ देवता—अग्नि, बृहस्पति, विश्वे देव आयुर्दा अग्ने जरसं वृणानो घृतप्रतीको घृतपृष्ठो अग्ने. घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रानभि रक्षतादिमम्.. (१) हे अग्नि! तू इस ब्रह्मचारी को वृद्धावस्था तक आयु प्रदान कर. हे घृत के कारण ebook converter DEMO Watermarks*