भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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पृष्ठ 859

को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (२) सूर्यो दिवोदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (३) सूर्य द्युलोक अर्थात् अपने निवास स्थान से जिस पुर की रक्षा के लिए उठते हैं. उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा सहित प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (३) चन्द्रमा नक्षत्रैरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (४) चंद्रमा नक्षत्रों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए उदय होता है, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (४) सोम ओषधीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (५) सोम ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (५) यज्ञो दक्षिणाभिरूद्रक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (६) यज्ञ दक्षिणा के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए प्रकट हुआ है, उस शय्या युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं. वह पुर तुम को सुख और कवच अर्थात रक्षा प्रदान करे. (६) समुद्रो नदीभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (७) सागर नदियों के साथ जिस पुर की रक्षा के लिए उद्यत हुआ है, उस शैया युक्त पुर में मैं तुझ राजा को पत्नी और प्रजा के साथ प्रवेश कराता हूं, वह पुर तुम्हें सुख और कवच अर्थात् रक्षा प्रदान करे. (७) ब्रह्म ब्रह्मचारिभिरुदक्रामत् तां पुरं प्र णयामि वः. तामा विशत तां प्र विशत सा वः शर्म च वर्म च यच्छतु.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*