अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 861, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ें(२) यत् ते तनूष्वनह्यन्त देवा द्युराजयो देहिनः. इन्द्रो यच्चक्रे वर्म तदस्मान् पातु विश्वतः.. (३) स्वर्गलोक में विराजमान शरीरधारी देवों ने असुरों से युद्ध करते समय अपने शरीर की रक्षा के लिए जिन कवचों को धारण किया था, इंद्र ने भी जिस कवच को पहना था, वह कवच युद्ध करने के लिए उद्यत हमारी सभी ओर से रक्षा करे. (३) वर्म मे द्यावापृथिवी वर्मार्हवर्म सूर्यः. वर्म मे विश्वे देवाः क्रन् मा मा प्रापत् प्रतीचिका.. (४) द्यावा पृथिवी, अग्नि एवं सूर्य मुझ युद्ध करने के इच्छुक को रक्षा करने वाला कवच प्रदान करे. हमारे अथवा हमारे राजा के समीप शत्रु सेना गुप्त रूप से न पहुंच सके. (४) सूक्त-२१ देवता—इंद्र गायत्र्यु १ ष्णिगुनुष्टुब् बृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब् जगत्यै.. (१) गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप तथा जगती नाम के छंदों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१) सूक्त-२२ देवता—मंत्र में कहे गए आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा.. (१) आंगिरसों अर्थात् अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के लिए आरंभ के पांच अनुवाकों के द्वारा यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (१) षष्ठाय स्वाहा.. (२) षष्ठ अर्थात छठे के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (२) सप्तमाष्टमाभ्यां स्वाहा.. (३) सातवें और आठवें के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (३) नीलनखेभ्यः स्वाहा.. (४) नीले नाखून वालों के लिए यह आहुति भलीभांति प्राप्त हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*