अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 879, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वमसि सहमानो ऽ हमस्मि सहस्वान्. उभौ सहस्वन्तौ भूत्वा सपत्नान्सहिषीवहि.. (५) हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! तुम शत्रुओं को वश में करने वाली हो तथा मैं शत्रु की हिंसा के साधन और बल से युक्त हूं. हम दोनों शत्रु को दबा के स्वभाव वाले हो कर अपने शत्रुओं को पराजित करें. (५) सहस्व नो अभिमातिं सहस्व पृतनायतः. सहस्व सर्वान् दुर्हर्दः सुहार्दो मे बहून् कृधि.. (६) हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! हमारे शत्रुओं अथवा पापों को पराजित करो. जो लोग हमारे विरुद्ध सेना एकत्र कर रहे हैं, उन को भी पराजित करो. मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले व्यक्तियों का विनाश करो और मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाओ. (६) दर्भेण देवजातेन दिवि ष्टम्भेन शश्वदित्. तेनाहं शश्वतो जनाँ असनं सनवानि च.. (७) देवों के समीप से उत्पन्न, द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित रहने वाले दर्भ के द्वारा मैं सर्वदा दीर्घजीवी जनों को प्राप्त करूं. (७) प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च. यस्मै च कामयामहे सर्वस्मै च विपश्यते.. (८) हे दर्भ! मुझ धारणकर्ता को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा श्रेष्ठ जनों का प्रिय बनाओ. अनुलोम और प्रतिलोम जाति के मध्य जिन लोगों को मैं अपना प्रिय बनाना चाहूं, पाप अन्वेषण करने वाले उस पुरुष को मेरा प्रिय बनाओ. (८) यो जायमानः पृथिवीमदृंहद् यो अस्तभ्नादन्तरिक्षं दिवं च. यं बिभ्रतं ननु पाप्मा विवेद् स नो ऽ यं दर्भो वरुणो दिवा कः.. (९) जिस दर्भ ने उत्पन्न होते ही पृथ्वी को दृढ़ किया था तथा जिस ने अंतरिक्ष और द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को स्थिर किया, उस दर्भ को जानने वाले को पाप स्पर्श नहीं करता. इस प्रकार का अंधकार निवारक दर्भ हमें प्रकाश दे. (९) सपत्नहा शतकाण्डः सहस्वानोषधीनां प्रथमः सं बभूव. स नोऽयं दर्भः परि पातु विश्वतस्तेन साक्षीय पृतनाः पृतन्यतः.. (१०) शत्रुओं का विनाश करने वाला, सौ गांठों से युक्त एवं शक्तिशाली दर्भ सभी ओषधियों अर्थात् जड़ीबूटियों से पहले उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार का दर्भ सभी दिशाओं के भयों से हमारी रक्षा करें. उस दर्भमणि की सहायता से मैं उस सेना को पराजित करूं, जिसे मेरा शत्रु ebook converter DEMO Watermarks*