भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 882, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 882

त्रिष्ट्वा देवा अजनयन् निष्ठितं भूम्यामधि. तमु त्वाङ्गिरा इति ब्राह्मणाः पूर्व्या विदुः.. (६) इस समय धरती पर स्थित तुम को इंद्र आदि देवों ने तीन बार उत्पन्न किया था. इस प्रकार के तुम को अंगिरा गोत्रीय ऋषि एवं ब्राह्मण जानते थे. (६) न त्वा पूर्वा ओषधयो न त्वा तरन्ति या नवाः. विबाध उग्रो जङ्गिडः परिपाणः सुमङ्गलः.. (७) हे जंगिड़ मणि! सृष्टि के आदि में उत्पन्न ओषधियां अर्थात् जड़ीबूटियां तुम से श्रेष्ठ नहीं हैं. नई ओषधियां भी तुम से श्रेष्ठ नहीं हैं. हे शत्रुसेना आदि को बाधा उत्पन्न करने वाली जंगिड मणि! तुम उग्र, चारों ओर से रक्षा करने वाली तथा भलीभांति मंगलकारी हो. (७) अथोपदान भगवो जङ्गिडामितवीर्य. पुरा त उग्रा ग्रसत उपेन्द्रो वीर्यं ददौ.. (८) हे कृत्या राक्षसी को दूर करने में स्वीकृत! हे अधिक माहात्म्य वाली! हे असीमित शक्ति वाली जंगिड़ मणि! अधिक शक्ति वाले प्राणी तुम्हें खा लेंगे, ऐसा जान कर इंद्र ने तुम्हें अधिक बल प्रदान किया है. (८) उग्र इत् ते वनस्पत इन्द्र ओज्मानमा दधौ. अमीवाः सर्वाश्चातयंजहि रक्षांस्योषधे.. (९) हे जंगिड़ नाम की वनस्पति अर्थात् जड़ीबूटी! तुम अधिक शक्ति वाली ही हो. इंद्र ने तुम में बल धारण किया है, इस कारण हे जंगिड़ ओषधि! तुम सभी रोगों का नाश करती हुई राक्षसों को नष्ट करो. (९) आशीरीकं विशिरीकं बलासं पृष्ट्यामयम्. तक्मानं विश्वशारदमरसां जङ्गिडस्करत्.. (१०) सभी प्रकार से हिंसक आशीरीक रोग को, विशेष रूप से हिंसक विशिरीक रोग को, बल का नाश करने वाले बलास रोग को, सभी अंगों में व्याप्त पृष्ठम रोग को, तक्मा रोग को तथा विश्वशारद रोग को जंगिड मणि पीड़ा पहुंचाने में असमर्थ बनाए. (१०) सूक्त-३५ देवता—जंगिड़ वनस्पति इन्द्रस्य नाम गृह्णन्त ऋषयो जङ्गिडं ददुः. देवा यं चक्रुर्भेषजमग्रे विष्कन्धदूषणम्.. (१) प्राचीन ऋषियों ने इंद्र का नाम लेते हुए रक्षा के इच्छुक मनुष्यों को जंगिड़ मणि दी. ebook converter DEMO Watermarks*