भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 884, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 884

शृङ्गाभ्यां रक्षो नुदते मूलेन यातुधान्यः. मध्येन यक्ष्मं बाधते नैनं पाप्माति तत्रति.. (२) यह शतवार मणि! अपने सींगों अर्थात् अगले भागों से अंतरिक्ष में स्थित राक्षसों को भगाती है तथा अपनी जड़ अर्थात् नीचे वाले भाग से राक्षसियों को दूर करती है. यह मणि अपने मध्य भाग से यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग को दूर करती है. पाप इस का अतिक्रमण नहीं कर पाता. (२) ये यक्ष्मासो अर्भका महान्तो ये च शब्दिनः. सर्वान् दुर्नामहा मणिः शतवारो अनीनशत्.. (३) जो उत्पन्न हुए अर्थात् प्रारंभिक अवस्था वाले यक्ष्मा अर्थात् टी. बी. रोग हैं, जो बढ़े हुए यक्ष्मा तथा जो कष्ट से चिकित्सा योग्य यक्ष्मा रोग हैं, इन सभी बुरे नाम वाले रोगों को शतवार मणि नष्ट कर देती है. (३) शतं वीरानजनयच्छतं यक्ष्मानपावपत्. दुर्नाम्नः सर्वान् हत्वाव रक्षांसि धुनुते.. (४) धारण की जाती हुई यह शतवार मणि सौ वीर पुत्रों को जन्म देती है तथा यक्ष्मा नाम के सौ रोगों को दूर भगाती है. यह सभी बुरे नाम वाले राक्षसों को नष्ट कर के ऐसा कर देती है कि ये पुनः उपद्रव न कर सकें. (४) हिरण्यशृङ्ग ऋषभः शातवारो अयं मणिः. दुर्नाम्नः सर्वांस्तृड्ढवाव रक्षांस्यक्रमीत्.. (५) सोने के समान चमकने वाले अग्र भाग वाली शतवार ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी सभी ओषधियों में श्रेष्ठ है. यह सभी अयश वाले जनों को तिनके के समान नष्ट कर के राक्षसों पर आक्रमण करे. (५) शतमहं दुर्नाम्नीनां गन्धर्वाप्सरसां शतम्. शतं शश्वन्वतीनां शतवारेण वारये.. (६) मैं कोढ़, दाद आदि सौ व्याधियों, सौ गंधर्वों तथा सौ अप्सराओं को दूर करता हूं. बारबार पीड़ा देने के लिए आने वाली सैकड़ों अपस्मार अर्थात पागलपन आदि व्याधियों को शतवार ओषधि से दूर करता हूं. (६) सूक्त-३७ देवता—अग्नि इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन् भर्गो यशः सह ओजो वयो बलम्. त्रयस्त्रिंशद् यानि च वीर्याणि तान्यग्निः प्र ददातु मे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*