भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 904, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 904

सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः. स इमा विश्वा भुवनान्यज्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः.. (२) यह काल रूप परमात्मा क्रम से पहियों के समान सात ऋतुओं को धारण करता है. इस संवत्सर रूप काल की सात नाभियां हैं और इस के अक्ष अर्थात् अरे नष्ट न होने वाले हैं. वह संवत्सर रूप काल उन सात भुवनों तथा इन में रहने वाले प्राणियों को व्यक्त करता हुआ सब से पहले उत्पन्न एवं दिव्य है. (२) पूर्णः कुम्भो ऽ धि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तम्ः. स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्.. (३) यह ब्रह्मांड रूप भरा हुआ कुंभ अर्थात् घड़ा संवत्सर रूपी काल पर रखा हुआ है. संत अर्थात् ज्ञानी पुरुष उस काल के दिवस, रात्रि आदि अनेक रूपों को देखते हैं. यह काल रूप परमात्मा सभी उपस्थित प्राणियों के सामने प्रकट होता है तथा उन्हें अपने में मिला लेता है. इस काल को आकाश के समान निर्लेप कहा जाता है. (३) स एव सं भुवनान्याभरत् स एव सं भुवनानि पर्यैत्. पिता सन्नभवत् पुत्र एषां तस्माद् वै नान्यत् परमस्ति तेजः.. (४) वही काल सब भुवनों को उत्पन्न करता है. वही काल सब भुवनों में व्याप्त होता है. वही काल इन भुवनों को उत्पन्न करने वाला पिता होता हुआ पुत्र भी होता है. उस काल के अतिरिक्त कोई भी तेज महान नहीं है. (४) कालोऽमूं दिवमजनयत् काल इमाः पृथिवीरुत. काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वि तिष्ठते.. (५) काल रूप परमात्मा ने इस द्युलोक अर्थात स्वर्ग को जन्म दिया. काल ने उन पृथ्वियों को उत्पन्न किया. काल में ही यह भूत, भविष्य एवं वर्तमान विश्व चेष्टा करता है. (५) कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः. काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति.. (६) काल ने भवनों वाले संसार को उत्पन्न किया है. काल की प्रेरणा से ही सूर्य संसार को प्रकाशित करता है. सभी प्राणी काल में ही वर्तमान रहते हैं. चक्षु आदि इंद्रियां अपना काम करती हैं. (६) काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्. कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः.. (७) काल में मन, प्राण तथा नाम व्याप्त हैं. ये सब प्रजाएं वसंत आदि रूप काल के कारण ebook converter DEMO Watermarks*