भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 909, कुल 1063 में से

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हैं, उन्हें हम जलों के मध्य त्रित नाम के महर्षि पर धारण करते हैं. (१) सं राजानो अगुः समृणान्यगुः सं कुष्ठा अगुः सं कला अगुः. समस्मासु यद् दुष्वप्न्यं निर्द्विषते दुष्वप्न्यं सुवाम.. (२) जिस प्रकार राजा लोग दूसरे के राष्ट्र का विनाश करने के लिए एकत्र हो जाते हैं, जिस प्रकार एक ऋण के न चुकाने पर बहुत से ऋण हो जाते हैं, जिस प्रकार कुष्ठ रोग होने पर बहुत से रोग हो जाते हैं, जैसे पशुओं के खुर आदि अनुपयोगी अंग फेंकने से गड्ढे अथवा पुराने कुएं में एकत्र हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपने दुःस्वप्न को उस के पास भेजते हैं जो हम से द्वेष करता है. (२) देवानां पत्नीनां गर्भ यमस्य कर यो भद्रः स्वप्न. स मम यः पापस्तद् द्विषते प्र हिण्मः. मा तृष्ठानामसि कृष्णशकुनेर्मुखम्.. (३) हे स्वप्न! तुम अप्सराओं के गर्भ हो, यमराज के हाथ हो. तुम्हारा जो मंगलकारी अंश है, वह मुझे प्राप्त हो. तुम्हारा जो क्रूर अंश है, उसे मैं उस के पास में भेजता हूं जो मुझ से द्वेष करता है. हे कौए के मुख से उत्पन्न दुःस्वप्न! तुम मेरे लिए बाधक मत बनो. (३) तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स त्वं स्वप्नाश्व इव कायमध्व इव नीनाहम्. अनास्माकं देवपीयुं पियारूं वप यदस्मासु दुष्वप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे.. (४) हे स्वप्न! तुम किस लिए उत्पन्न हुए हो, यह सब हम जानते हैं. घोड़ा जिस प्रकार अपने धूलि धूसरित अंगों को कंपित करता है और अपनी काठी आदि को दूर फेंक देता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें अपने शत्रु के पास तथा देवों के यज्ञों में बाधा डालने वाले के पास फेंकता हूं. हमारे शरीर में, हमारी गायों में और हमारे घरों में जो दुःस्वप्न का फल है, वह हमारे शत्रु और देव शत्रु अर्थात् यज्ञ कर्म में बाधा डालने वाले पर पहुंचे. (४) अनास्माकस्तद् देवपीयुः पियारूर्निष्कमिव प्रति मुञ्चताम्. नवारत्नीनपमया अस्माकं ततः परि. दुष्वप्न्यं सर्वं द्विषते निर्दयामसि.. (५) हे स्वप्न! तेरे अनिष्ट फल को हमारा तथा देवों का शत्रु अपने शरीर पर स्वर्ण के आभूषण के समान धारण करे. हमारे दुःस्वप्न का जो फल है, वह हम से नौ मुट्ठी दूर हट जाए. हम दुःस्वप्न के बुरे प्रभाव को अपने शत्रु की ओर भेजते हैं. (५) सूक्त—५८ देवता—मंत्रों में बताए गए ebook converter DEMO Watermarks*

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