अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 912, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—६१ देवता—ब्रह्मणस्पति तनूस्तन्वा मे सहे दतः सर्वमायुरशीय. स्योनं मे सीद पुरुः पृणस्व पवमानः स्वर्गे.. (१) मैं जीवनभर अपने दांतों से खाता रहूं. मैं शत्रुओं को अपने शरीर से दबाने में समर्थ रहूं. हे अग्नि! तुम मेरे घर में सुख से प्रतिष्ठित रहो. तुम स्वर्ग में भी मुझे सुख से संपन्न बनाओ. (१) सूक्त—६२ देवता—ब्रह्मणस्पति प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु. प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये.. (१) हे अग्नि! तुम मुझे देवों का प्रिय बनाओ. मुझे राजाओं का भी प्रिय करो. मैं सभी देखने वालों का, शूद्रों का और आर्यों का प्रिय बनूं. अर्थात् सब का प्रिय बनूं. (१) सूक्त—६३ देवता—ब्रह्मणस्पति उत् तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान् यज्ञेन बोधय. आयुः प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! उठो और देवों को मेरे यज्ञों का ज्ञान कराओ. तुम इस यजमान की आयु, प्राण, प्रजा, पशु तथा कीर्ति को बढ़ाओ. तुम इस यजमान की वृद्धि करो. (१) सूक्त—६४ देवता—अग्नि अग्ने समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे. स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्र यच्छतु.. (१) मैं महान और जातवेद अग्नि के लिए प्रज्वलित होने का साधन समिधाएं लाया हूं. समिधाओं से वृद्धि को प्राप्त जातवेद अग्नि मुझे श्रद्धा और बुद्धि प्रदान करें. (१) इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि. तथा त्वमस्मान् वर्धय प्रजया च धनेन च.. (२) हे जातवेद अग्नि! हम प्रज्वलित होने के साधन समिधाओं के द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम हमें प्रजा और धन से बढ़ाओ. (२) यदग्ने यानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि. ebook converter DEMO Watermarks*