भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 922, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 922

करो. हे इंद्र! पणियों द्वारा चुराई गई हमारी गायों को हमें लाकर दो. (१) अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय. उरुव्यचा जठर आ वृषस्व पितेव नः शृणुहि हूयमानः (२) हे इंद्र! तुम्हें सोम की इच्छा करने वाला कहा जाता है, तुम हमारे सामने आओ. यह निचोड़ा हुआ सोम तुम अपनी प्रसन्नता के लिए पियो. तुम विशाल कोखों वाले अपने उदर को इस सोम से भर लो. हे इंद्र! पिता जिस प्रकार पुत्र का वचन सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारे आह्वान को सुनो. (२) आपूर्णो अस्य कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै. समु प्रिया आववृत्रन् मदाय प्रदक्षिणिनद्भि सोमास इन्द्रम्.. (३) इंद्र के लिए यह पूर्ण कलश सोम रस से भरा हुआ है. जिस प्रकार जल छिड़कने वाला मशक को जल से भरता है, उसी प्रकार अध्वर्यु इंद्र के पीने के लिए सोमरस निचोड़ता है. ये सोम इंद्र की प्रसन्नता के लिए इंद्र की ओर जाते हैं. (३) सूक्त—९ देवता—इंद्र तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः. अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (१) हे यजमानो! तुम्हारे यज्ञ की पूर्णता तथा तुम्हारे अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए हम स्तुतियों के द्वारा इंद्र से प्रार्थना करते हैं. इंद्र दर्शनीय और दुःख विनाशक हैं. इंद्र सोम पीने के हर्ष से पूर्ण रहते हैं. गाएं सायं और प्रातःकाल रंभाती हुईं जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार हम भी स्तुति करते हुए इंद्र की ओर जाते हैं. (१) द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्. क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तम्रीमहे.. (२) जिस प्रकार दुर्भिक्ष पड़ने पर लोग कंद, मूल, फल आदि से संपन्न पर्वत की प्रार्थना करते हैं, उसी प्रकार हम सुंदर दान वाले, प्रजाओं के पोषक, दीप्ति युक्त, स्तुति करने योग्य एवं गाय आदि से संपन्न धन की प्रार्थना करते हैं. (२) तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये. येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (३) हे इंद्र! मैं तुम से शोभन बल युक्त एवं उत्तम अन्न की याचना करता हूं. तुम ने जो धन यज्ञ कर्म न करने वालों से छीन कर भृगु ऋषि को शांति प्रदान की थी और जिस धन से तुम ने कण्व के पुत्र प्रस्कण्व का पालन किया, वही धन हम तुम से मांगते हैं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

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