भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 954, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 954

वृत्रस्य चिद् विदद् येन मर्म तुजन्निशानस्तुजता कियेधाः.. (६) इन्हीं इंद्र के लिए विश्वकर्मा ने वज्र नाम का आयुध बनाया था जो अतिशय शोभन तथा स्तुति के योग्य हैं. इस वज्र का निर्माण युद्ध के लिए तथा आक्रमण करने वाले शत्रुओं को रोकने के लिए किया गया है. सब के स्वामी इंद्र ने इस वज्र से वृत्र राक्षस के मर्म स्थान में प्रहार किया था. (६) अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाञ्चार्वन्ना. मुषायद् विष्णुः पचतं सहीयान् विध्यद् वराहं तिरो अद्रिमस्ता.. (७) सब के निर्माणकर्ता और महान इंद्र के असाधारण कर्म का वर्णन किया जा रहा है. इस इंद्र ने सोमयाग संबंधी यज्ञों में सोमरस का पान किया तथा पुरोडाश के अन्न का भक्षण किया है. तीनों सवनों अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल के हवनों में व्याप्त तथा शत्रुओं का संहार करने वाले इंद्र ने शत्रुओं का धन छीन लिया है. पर्वतों पर वज्र का प्रयोग करने वाले इंद्र ने वर्षा को रोकने वाले मेघ को विदीर्ण किया था. (७) अस्मा इदु ग्नाश्चिद् देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवुः. परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः.. (८) इस इंद्र के लिए इंद्राणी आदि देव पत्नियों ने स्तोत्र का उच्चारण किया. इस इंद्र ने विस्तृत स्वर्ग और पृथ्वी को अपने तेज से अतिक्रमण किया था. द्यावा और पृथ्वी इंद्र के महत्व को पराजित नहीं कर पाए. (८) अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्. स्वरालिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिमत्रो ववक्षे रणाय.. (९) इस इंद्र का महत्व द्युलोक और पृथ्वी से भी बढ़ कर है. ये इंद्र शत्रुओं पर अपने ही तेज से सुशोभित होते हैं. इस प्रकार के इंद्र संग्राम के लिए जाते हैं अथवा वर्षा करने के लिए मेघों के समीप पहुंचते हैं. (९) अस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद् वज्रेण वृत्रमिन्द्रः. गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः.. (१०) इन्हीं इंद्र देव के बल से जो वृत्र राक्षस भयभीत हो रहा था इंद्र ने अपने वज्र से उस का शीश काट दिया एवं पणियों द्वारा चुरा कर रखी गई गायों को मुक्त किया. इंद्र ने मेघ का भेदन कर के सभी प्राणियों की रक्षा के कारण जलों को मुक्त किया. इंद्र हवि देने वाले यजमान के समान अपना मन बना कर प्रसिद्ध अन्न प्राप्त कराएं. (१०) अस्येदु त्वेषा रन्त सिन्धवः परि यद् वज्रेण सीमयच्छत्. ईशानकृद दाशुषे दशस्यन् तुर्वीतये गाधं तुर्वणिः कः.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*