अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 967, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगे बढ़ते हैं. (२१) सूक्त-४८ देवता—गौ अभि त्वा वर्चसा गिरः सिञ्चन्त्या राचरण्युवः. अभि वत्सं न धेनवः.. (१) विचरण करने वाली गाएं, जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार हमारी वाणी तुम्हें प्राप्त होती है और तुम्हें सींचती हैं. (१) ता अर्षन्ति शुभ्रियः पृञ्चन्तीर्वर्चसा प्रियः. जातं जात्रीर्यथा हृदा.. (२) जिस प्रकार माता जन्म लेने वाले बच्चे को अपने हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार सुंदर स्तुतियां इंद्र को तेज से सुशोभित करती हैं. (२) वज्रापवसाध्यः कीर्तिर्म्रियमाणमावहन्. मह्यमायुर्घृतं पयः.. (३) ये वज्रधारी इंद्र मुझे यश, आयु, घृत और दूध प्रदान करें. (३) आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (४) ये सूर्य रूपी इंद्र उदयाचल पर पहुंच गए हैं. इन्होंने पूर्व दिशा में दर्शन दे कर सभी प्राणियों को अपनी किरणों से ढक लिया है. इस के लिए उन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को वर्षा के जल से खींच कर व्याप्त कर लिया है. वर्षा का जल अमृत के समान है. उस को दुहने के कारण ही इंद्र को गौ कहा जाता है. (४) अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः. व्यख्यन्महिषः स्व :.. (५) जो प्राणी प्राण अर्थात् सांस लेने और अपान वायु त्यागने का कार्य करते हैं, उन के शरीर में सूर्य की प्रभा प्राण के रूप में विचरण करती है. सूर्य ही सब लोकों को प्रकाशित करते हैं. (५) त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः.. (६) सूर्य की किरणों से तीस मुहूर्त दीप्त होते हैं. वे ही दिन और रात के अंग बनते हैं. वेदों की वाणी सूर्य का उसी प्रकार आश्रय लेती है, जिस प्रकार पक्षी वृक्ष का आश्रय लेते हैं. (६) सूक्त-४९ देवता—इंद्र यच्छक्रा वाचमारुहन्नन्तरिक्षं सिषासथः. सं देवा अमदन् वृषा.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*