अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 982, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे इंद्र! तुम ने असुरों को मारा और उन के दृढ़ नगरों का विनाश किया है. तुम स्वर्ग के स्वामी हो और मनुष्यों की वृद्धि करते हो. (३) एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (४) हे अध्वर्युजनो! शहद से भी अधिक मीठे अन्न से इंद्र को तृप्त करो. ये इंद्र सदा यजमान की वृद्धि करते हुए स्तुतियां स्वीकार करते हैं. (४) इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदानंश शवसा न भन्दना.. (५) हे हरे रंग के अथवा हरि नाम वाले घोड़ों पर सवार होने वाले इंद्र! तुम्हारे पूर्व कर्म के बलों और कल्याणों की कोई समानता नहीं कर सकता. (५) तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (६) अन्न की कामना वाले हम अन्न के स्वामी इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाते हैं. जिन यज्ञों का अनुष्ठान विधिपूर्वक किया जाता है. उन से इंद्र की सदा वृद्धि होती है. (६) सूक्त-६५ देवता—इंद्र एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखाय स्तोम्यं नरम्. कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्.. (१) हम स्तुति के योग्य एवं अपने सखा के समान इंद्र से इधर आने के लिए स्तुति करते हैं. ये इंद्र सभी कर्मों के फल प्रदान करते हैं. (१) अगोरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः. घृतात् स्वादीयो मधुनश्च वोचत.. (२) हे स्तोताओ! इन तेजस्वी, देखने योग्य वाणी रूपी अन्न वाले तथा गायों को न रोकने वाले इंद्र के प्रति शहद और घी से भी अधिक मधुर वाणी का उच्चारण करो. (२) यस्यामितानि वीर्या ३ न राधः पर्येतवे. ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा.. (३) कार्य साधन के हेतु असीमित शक्ति वाले इंद्र दीप्तिमती दक्षिणा के रूप हैं. (३) सूक्त-६६ देवता—इंद्र स्तुहीन्द्रं व्यश चवदनूर्मिं वाजिनं यमम्. अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*