आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० ।। श्रीमदभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतराम् ।। ॐ श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यविरचितः आत्मबोधः जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य भगवान् ने उत्तम अधिकारियों के लिये प्रस्थानत्रयी (प्रस्थान-परमतत्त्व की प्राप्तिका साधन। गीता दशोपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र, ये तीन प्रस्थान हैं।) की रचना करके, उसको जानने में असमर्थ मन्दबुद्धि वालें जिज्ञासुओं पर कृपा करने के लिए सर्व वेदान्त सिद्धान्त रूपी धन संयुक्त 'आत्मबोध' नामक प्रकरण ग्रन्थ की रचना की प्रतिज्ञा ग्रन्थ के आदि में करते हैं- ॐ तपोभिः क्षीणपापानां शांतानां वीतरागिणाम् । मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ।।१।। व्याख्या- कृच्छ्रचान्द्रायण, नित्य और नैमित्तिक आदि कर्मों को शास्त्रों में 'तप' शब्द से कहा गया है। ऐसे तप का फलाभिसंधि से रहित होकर अनुष्ठान करने से जिनके पाप (अन्तःकरण के रागादि दोष) क्षीण हो गये हैं। अत एव जो शान्त हैं तथा जिनसे राग अर्थात् ऐहिक और पारलौकिक भोगों की आकाङ्क्षा निवृत्त हो गयी है, ऐसे संसार रूपी ग्रन्थि -भेदन में तत्पर साधनचतुष्टय संपन्न मुमुक्षुओं के लिए