आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभयादयः । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्र' इत्यादिश्रुतिशासनात् ।।३२।। आत्मस्वरूप मुझमें मन का अभाव होने से दुःख, राग, द्वेष, भय आदि का अभाव है। आत्मा में इन्द्रिय, प्राण और मन का अभाव कैसे हैं? ऐसी आशङ्का होने पर प्रमाण रूप से श्रुति को प्रस्तुत करते हैं। मुण्डकोपनिषद् की श्रुति कहती है, "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः।" (मुण्ड २/१/२) ।।३२।। अब अगले तीन श्लोकों से गुरु की प्रसन्नता से अनुभूत ज्ञान को प्रकट करते हैं- निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विकल्पो निरञ्जनः । निर्विकारो निराकारो नित्यमुक्तोऽस्मि निर्मलः।।३३।। मैं बुद्ध्यादि का अभाव होने से निर्गुण, इन्द्रियों का अभाव होने से निष्क्रिय, अविद्या के कार्य से रहित होने से नित्य, मन का अभाव होने से निर्विल्प, अज्ञान का अभाव होने से निरञ्जन, शरीर का अभाव होने से विकाररहित, निरवयव होने से निराकार, नित्यमुक्त तथा निर्मल हूँ ।।३३।। अब अवशिष्ट स्वरूप को अग्रिम श्लोक से कहते हैं- अहमाकाशवत्सर्वबहिरन्तर्गतोऽच्युतः । सदा सर्वसमः शुद्धो निःसङ्गो निर्मलोऽचलः ।।३४।। जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है, उसी तरह मैं सम्पूर्ण दृश्य समुदाय के बाहर-भीतर व्याप्त, किसी भी प्रकार की च्युति (स्वरूप नाश) से रहित, विषम वस्तुओं में भी समान रूप से स्थित, शुद्ध (निर्लिप्त) तथा पूर्ण होने से अचल हूँ ।।३४।।