आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१ तीर्त्वा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषादिराक्षसान्। योगी शान्तिसमायुक्तो ह्यात्मारामो विराजते।।४९।। अपरिमित मोह रूपी समुद्र को ज्ञानरूपीनौका से पार करके, मोक्ष के विरोधि राग, द्वेष आदि राक्षसों को मार करके शम दम आदि से विशिष्ट ज्ञानी जीवन्मुक्त पुरुष आत्मा में ही रमण करते हुए स्वराज्य में अभिषिक्त होकर विराजमान होता है ।।४६।। अब जीवन्मुक्त का लक्षण बताते हैं- बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वाऽऽत्मसुखनिर्वृतः। घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ।।५०।। बाह्येन्द्रियों का विषयों के सम्बन्ध से जन्य अनित्य सुख की आसक्ति का परित्याग करके, आत्मसुखरूप से संपन्न, स्वसाक्षी रूप से आत्मानुभव करने वाला ही जीवन्मुक्त कहलाता है। जैसे घट के भीतर रखा हुआ दीपक भीतर-ही-भीतर प्रकाशित होता रहता है। उसी प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष आत्मसुख का अनुभव नित्य करना है। किन्तु अन्यों के द्वारा नहीं जाना जाता ।।५०।। इस प्रकार कहा गया जीवन्मुक्त पुरुष प्रारब्धक्षय होने तक स्थित रहता है। इसे अगले श्लोक से स्पष्ट करते हैं- उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मैर्न लिप्तो व्योमवन्मुनिः। सर्वविन्मूढवत्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ।।५१।। मननशील जीवन्मुक्त पुरुष देहादि उपाधियों के साक्षीरूप से होने पर भी आकाश के समान उपाधि के धर्मों से लिप्त नहीं होता। सर्वज्ञ होने पर भी प्राकृत (अज्ञानी) मनुष्यों के समान स्थित