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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

४८ जीवः सर्वमलान्मुक्तः स्वर्णवद्द्योतते स्वयम्॥६६॥ जीव शब्द वाच्य साभास अहंकार यहां श्रवण मनन आदि से प्रकाशित होकर, ज्ञानरूपी अग्नि से शोधित किए जाने पर सभी अज्ञानात्मक मल से मुक्त होकर स्वयं ही सम्यक् रूप से प्रकाशित होता है। जैसे स्वर्ण को अग्नि में तपाये जाने पर वह अशुद्धियों को छोड़कर स्वरूपतः प्रकाशित होता है। ठीक वैसे ही ॥६६॥ इस प्रकार शोधित होकर परमात्मस्वरूप जीव हृदयाकाश में स्थित अज्ञानान्धकार का उपसंहार करके सूर्य के समान प्रकाशित होता है। अब इसे बताते हैं- हृदाकाशोदितो ह्यात्मा बोधभानुस्तमोऽपहत्। सर्वव्यापी सर्वधारी भाति भासयतेऽखिलम्॥६७॥ जैसे आकाश में उदित हुआ सूर्य अन्धकार का नाश करके प्रकाशित होता है। वैसे ही हृदयाकाश में उदित हुआ बोधात्मक सूर्य सर्वव्यापक, सर्वाधार, सच्चिदानन्द स्वरूप आत्मा अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करके सम्पूर्ण प्रपञ्च को प्रकाशित करता है। 'सर्वात्मक ब्रह्म मैं ही हूँ, इस प्रकार सर्वात्मक रूप से प्रकाशित होता है।' श्रुतियाँ भी कहती हैं, "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (सम्पूर्ण दृश्यमान प्रपञ्च निश्चित रूप से ब्रह्म ही है।) इत्यादि ॥६७॥ शङ्का- आत्मज्ञानी को परमात्मज्ञान के प्रतिबन्धक पापों का नाश करने के लिए नाना प्रकार के पदार्थों से याग करना चाहिए? समाधान करते हैं- दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य सर्वगं शीतादिहन्नित्यसुखं निरञ्जनम्। यः स्वात्मतीर्थं भजते विनिष्क्रियः

४६ स सर्ववित्सर्वगतोऽमृतो भवेत् ।।६८।। ।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कर- भगवत्पादाचार्यविरचित आत्मबोधः।। जो निष्क्रिय परमहंस महापुरुष आत्मरूपी तीर्थ में अवगाहन कर लेता है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत विद्वान् परमात्मस्वरूप होने से अमृत हो जाता है। अर्थात् मुक्त हो जाता है। वह आत्मतीर्थ कैसा है? ऐसी आशंका होने पर बताते हैं- जो देश, काल आदि की अपेक्षा न रखकर सर्व व्यापक, शीत-उष्ण आदि दुःखों को हरने वाला परमानन्द का हेतु होने से नित्यसुखस्वरूप, माया के लेप से रहित होने से निरञ्जन है, ऐसे आत्मतीर्थ में ही परमहंस रमण करते हैं। इतर तीर्थ आत्मतीर्थ से विपरीत हैं। अतः आत्मतीर्थ में रमण करने वाले ज्ञानी को कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता ।।६८।। (इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य कैलास पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती द्वारा रचित आत्मबोध व्याख्या समाप्त हुई।) समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥