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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

४६ स सर्ववित्सर्वगतोऽमृतो भवेत् ।।६८।। ।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमच्छङ्कर- भगवत्पादाचार्यविरचित आत्मबोधः।। जो निष्क्रिय परमहंस महापुरुष आत्मरूपी तीर्थ में अवगाहन कर लेता है, वह सर्वज्ञ, सर्वगत विद्वान् परमात्मस्वरूप होने से अमृत हो जाता है। अर्थात् मुक्त हो जाता है। वह आत्मतीर्थ कैसा है? ऐसी आशंका होने पर बताते हैं- जो देश, काल आदि की अपेक्षा न रखकर सर्व व्यापक, शीत-उष्ण आदि दुःखों को हरने वाला परमानन्द का हेतु होने से नित्यसुखस्वरूप, माया के लेप से रहित होने से निरञ्जन है, ऐसे आत्मतीर्थ में ही परमहंस रमण करते हैं। इतर तीर्थ आत्मतीर्थ से विपरीत हैं। अतः आत्मतीर्थ में रमण करने वाले ज्ञानी को कोई भी कर्त्तव्य शेष नहीं रह जाता ।।६८।। (इस प्रकार परमहंस परिव्राजकाचार्य कैलास पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती द्वारा रचित आत्मबोध व्याख्या समाप्त हुई।) समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो महामतिः॥