आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 235 में से
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आयुर्वेद दर्शन
विकार, फोड़े फुन्सियाँ, मूत्रकृच्छ्र, पृथमेह, हृद्वैरोग ये अधिक हुआ करते हैं। दस्त की हाजत इतनी होती है कि भगना पड़ता है। ये प्रायः उपःकाल के पहिले ही जाग जाते हैं। बड़े स्तानभ्रिय होते हैं। स्वास्थ्य श्री५म व शरद् में खराब रहता है। प्रायः कन्या संतति अधिक होती है। और तिक्र रस से बहुत द्वेष करते हैं।
वात प्रकृतिः—वातस्तु रूक्ष लघु चल बहु शीघ्र शीत पशुष विषदः। तस्य रौक्ष्यात् वातला रूक्षापचितालपक्षीराः, प्रततरूक्षक्षामभिन्नसक्तजर्जरस्वराः, जागरूकाश्च, लघुत्वात् लघु-चपलगतचिघ्राहारीविहाराः, चलत्वात् अनवस्थित संध्यस्थिघ्न-हन्वोष्ठ जिन्हाशिः स्कंधपाणिपादाः, बहुत्वात् बहुप्रलपकंडर-शिरा प्रतानाः, शीघ्रत्वात् शीघ्र समारंभ क्षोभविकाराः, शीघ्रो-त्वास रागविरागाः श्रुतप्राहिणोऽल्पस्मृतयश्च, शैत्यात् शीतास-हिष्णवः प्रततशीतकोद्वेषकर्स्तंभाः, पारुष्यात् पशुषकेशश्चमश्रुरोम नखदक्षनवदनपाणिपादांगाः, वैश्यात् स्फुटितांगावयवाः, सतत संधिश्चन्द्रगामिनः। त एवं गुणयोगात् वातलाः प्राये-णाल्पबलान्नाल्पायुषान्नाल्पापत्यान्नाल्पसाधनान्नाधन्याः ॥
शुश्रुत में विशेष यह कहा है कि वातप्रकृति अपने से ही बहबढाया करता है। और स्वप्न में अपने को उड़ता हुआ देखता है।