आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंचाथोंविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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सोम, संज्ञक धर्मों के साथ प्रस्थापित करते थे। अर्थात् त्रिधातुवादियों की दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा तत्त्वतः ‘धर्म’ हैं।
इतिहास-प्रसिद्ध ‘वातकलाकलीय’ परिषद् इस त्रिधातु-सिद्धांत को प्रस्थापित करने के लिये ही हुई। अतः अब उस पर भी विचार करें।
वातकला कलीय परिषद्
इस परिषद् में सर्व प्रथम सांङ्कलायन कुश ने कहा कि:— ‘रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदाः षड्मे वातगुणाभवंति’। इस पर कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि:— ‘सत्त्रैरेवैगुणैरेवं द्रव्यैरेवंप्रभावेच्छ कर्माभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासो हि धातूनांवृद्धिकारणम्’। इस पर वाल्ही-कभिषक् कांकायन ने कहा कि ‘अतोविपरीतानि वातस्य प्रशमनानि भवंति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’। इस पर धामार्गेव बडिस ने कहा कि ‘वातप्रकोपनानि खलु रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदसुक्षिरकराणि शरीराणां, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं गत्वा आप्वायमानः प्रकोप-मापद्यते। वातप्रशमनानि पुनः स्तिग्धगुरुष्णश्चक्षुमृदु पिच्छलघनकराणि शरीराणां, तथा विधेषु शरीरेषु वायुरासञ्जयमानश्चरन् प्रज्ञांतिमापद्यते’। इन ऋषित्रयों के वक्तव्य में ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं कि:— इसमें गुर्वादि विशलि गुणों के आधार पर वातपित्तश्लेष्माओं के