भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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भारद्वाज का स्वभाववाद.

भारद्वाजः—कर्मवाद का खंडन करते हुए भारद्वाज ने कहा किः—

भारद्वाजस्तु नेत्याह कर्ता पूर्व हि कर्मणः ।

दृष्टं न चाकृतं कर्म यस्य स्यात्पुरुषः फलम् ॥

अर्थात् कर्म, ( अकृत कर्म ) पुरुषरोगोत्पादक नहीं हो सकता क्योंकि कर्म के पूर्व उसके कर्ता का अस्तित्व मानना ही होगा । बिना किया हुआ कर्म जिसका फल ' पुरुष ' हो; देखने में नहीं आया ।

भद्रकाण्य, पुरुषोत्पादक कर्म को ' अकृत ' कहते थे । अतः भारद्वाज ने सिर्फ उनके प्रतिवाद के लिये ही यहाँ ' कृत ' कर्मवाद का अवलंब किया है । वास्तव में देखा जाय तो भारद्वाज को वह भी मान्य नहीं है । भारद्वाज, अब स्वमत कहते हैं किः—

भावहेतुः स्वभावस्तु न्याधीनां पुरुषस्य च ।

स्वर द्रव चलोष्णत्वं तैजोऽस्तानां यथैव हि ॥

अर्थात् उत्पत्ति का कारण ' स्वभाव ' है । पुरुष और न्याधियों की उत्पत्ति भी स्वभावतः होती है जैसा कि पृथ्वी