भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

को वातपित्तश्लेष्मा कहना चाहते हैं। भारद्वाज, द्रव्य-प्रधानतावादी हैं। उनकी दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा भी द्रव्य ही हैं।

भारद्वाज, यद्यपि गुण वर्ग में गुर्वादि, शब्दादि, परादि सभी का अंतर्भाव करते हैं तथापि उनको गुर्वादि गुणों का ही प्राधान्यत्व मान्य है; इतना ही नहीं तो गुर्वादि गुण प्रधानता वाद के आद्य प्रवर्तक ही भारद्वाज हैं। भारद्वाज ने ही सर्व प्रथम आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि लक्षण घोषित किया। प्रायः इसी हेतु से स्वभाववाद का समर्थन करते हुए भारद्वाज ने पृथिव्यादिकों के स्वर द्रवादि लक्षणों का ही उल्लेख किया है; शब्दादिकों का नहीं। और वातकला-कलीय परिषद् में भी जो कि अग्नीषोमलोकपक्षियों की थी; भारद्वाज सिर्फ गुर्वादि गुणों के आधार पर 'समानगुणाभ्यासो हि धातूनां वृद्धिकारणम्' यह प्रतिपादन करने के लिये ही उपस्थित हुए थे।