भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

१२२

आयुर्वेद-दर्शन

यह जान लेने पर कि कांकायन, बल्हीक देश के भिषक् थे और उनका प्रजापतिवाद, विशुद्ध वैदिक ( ब्राह्मण ग्रंथों व उपनिषदों की स्मृति के पूर्व का अथवा केवल मंत्रों के आधार पर प्रतिपादित ) संप्रदाय है; ऐतिहासिक दृष्टि से यज्ञःपुरुषीयपरिषद् के काल निर्णय में एक साधन उपलब्ध हो जाता है अस्तु ।

कांकायन का प्रजापतिवाद, जिस वैदिक मंत्र के आधार पर है वह निम्न लिखित है:—

यस्माच्च जातःपरोऽअन्यो अस्ति, य आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजया सर्द-रराण स्त्रीणि ज्योतीर्द-षि सचेत सपोदशी ॥ ( यजुर्वेद अ. ८ मंत्र १६ )

अर्थात् जिससे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, जो समस्त भुवनों में अंतर््यामी रूप से प्रविष्ट है, जो प्रजा ( सचेतन-स्मृतिगत जीवात्मा ) के रूप में रमा हुआ है और जो षोडष-कलात्मक अर्थात् पूर्ण है वह प्रजापति, अपनी तीन ज्योतियों को व्यक्त करता है ।

यह श्रुति, प्रजापति दैवत्या है अर्थात् इस में प्रजापति का वर्णन है । कांकायन, इस प्रजापति को 'ब्रह्म' का अपत्य कहते हैं । यहां ब्रह्म, प्रजापति, उसकी तीन ज्योतियाँ और उसकी प्रजा इन पर थोड़ा अधिक विचार करना होगा ।