आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 235 में से
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आयुर्वेद-दर्शन
धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेह नाकं महिमानः संचत यत्र पूर्व साध्याः सति देवाः” । ( पु. सू. मं. १६ ) अर्थात् प्रजापति के ‘ प्राण ’ रूप देवों ने परस्पर के संगतिकरणदानरूप व्यापार के द्वारा यज्ञपुरुष की पूजा की अर्थात् अचेतन-सचेतन बिराट् पैदा किया । ये देव, जोकि वास्तव में ‘ धर्म ’ हैं; सर्व प्रथम पैदा हुए । सृष्टिरूपयज्ञ के विधायक उक्त प्राथमिक धर्म, सृष्ट्युत्पत्ति के पूर्व उस ‘ अमृतत्व ’ रूप त्रिपाद स्वर्ग में अनादि चतुष्पाद पुरुष की ‘ महिमा ’ होकर रहते थे जहां कि पुरा कल्प क भी साधक धर्म रहते आये हैं ।
प्रजापति दैवत्या श्रुति में इन धर्मों को ‘ व्योति ’ शब्द से संबोधित किया है और यह स्पष्ट किया है कि उक्त धर्म ‘ तीन ’ हैं । सारांश प्रजापति, सर्व प्रथम प्राण संज्ञक तीन प्रधान धर्मों म परिणत होता है ।
इन धर्मों के विषय में भिन्न २ मत भी दिखाई देते हैं । उदा० ‘ यस्मान्न जातः ’ यह मंत्र आयुर्वेद में दो जगह आया है । तहां ८ वें अध्याय में भाष्यकार ने अग्नि, वायु और सूर्य इनका उल्लेख किया है और ३२ वें अध्याय में रवि, इंद्र और अग्नि का । किंतु आयुर्वेद में क्रमशः वायु, अग्नि, सोम इन्हीं को स्वीकार किया है । आयुर्वेद में इनको प्राण शब्द से भी संबोधित करते हैं ।