भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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भिखु आत्रेय का कालवाद

१४१

और:—

‘विसर्गादानविश्वेषैः सोमसूर्यानिला यथा ।

धारयति जगदेहं कफपित्तानिला तथा ॥ ३०

किंतु जब इन सब वदनाओं का तात्विक दृष्टि से विचार होने लगा तब इस विषय में भिन्न २ मत प्रकट किये जाने लगे ।

धातुपंचकवादियों का कहना था कि जब कि सोमसूर्य-वायु, तत्त्वतः धातुपंचक से आविरिक्त नहीं हैं तब संवत्सरात्मक काल भी धातुपंचक का ही परिणाम है ।


१ त्रिधातुसिद्धांत या प्रजापतिवाद के अनुसार यहाँ अनिल, सूर्य, सोम शब्दों से घर्मत्रयी का भी ग्रहण किया जा सकता है । पर उस अवस्था में विशेष का अर्थ ‘व्यक्तीभवन’ होगा । क्योंकि भिखु आत्रेय ने काल को और उक्त दोनों संप्रदायोंने वायु को ‘जगद्व्यक्ति कर’ अथवा ‘भावकर’ ही सिद्ध किया है । अन्यत्र भी विशेष का अर्थ ‘सूक्ष्म का स्थूल में अथवा एक का अनेक में परिणत होना’ ही किया गया है । जैसा कि ‘द्वे रूपे निश्चिते पूर्वे मायायाः कूलनंदन । विशेषावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ॥ लिंगाद्य ब्रह्म-पर्यंतं सूक्ष्म स्थूल विभेदतः । अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमाहृत्य तिष्ठति ॥ इस पर से व्यक्त होता है । ‘विसर्ग’ और ‘आदान’ शब्दों से ‘संस्कत्याकर्षण’ तथा ‘घनता’ के अर्थात ही बल के दृष्टि-क्षयों को स्वीकार करना उचित है ।