आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनर्वसु आश्रय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत
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प्रकार हैं। क्योंकि उनमें पैदा होने वाले प्राणियों की रचना असंख्य प्रकार की है। तहाँ जरागुज और अंढज प्राणियों को पैदा करने के समय उक्त गर्भोत्पादक भाव, रचना विशेष के अनुसार भिन्न २ य्रेनिओं में भिन्न-भिन्न रूप-धारण करते हैं। जिस तरह सोना, चाँदी, तांबा आदि धातुओं का तत्परस भिन्न-भिन्न आकार के मोम के सांचे में ढालने पर भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है; यदि उसे मनुष्याकृति सांचे में ढाला जाय तो वह मनुष्याकृति बनता है उसी तरह गर्भ, समुदायात्मक होते हुए भी मनुष्य योनि में मनुष्य रूप धारण करता है। यही कारण है कि मनुष्य, मनुष्य से पैदा होता है। इस पर यदि यह कहो कि अंधे से अंधे की और मूर्ख से मूर्ख की पैदाइश क्यों नहीं होती ? तो इसका उत्तर यह है कि बीज व फल में अंगों के जो सूक्ष्म भाग रहते हैं उनमें से एक या अनेक भाग जब विकृत होते हैं, तब गर्भ के भी वे अंग विकृत पैदा होते हैं, अन्यथा नहीं होते। फलतः पितृ सृष्टि पैदा होना और न होना दोनों बातें सम्भवनीय हैं। प्राणीमात्र के इन्द्रिय, आत्मा से ( आत्म-निबद्ध कर्म से ) पैदा होते हैं। उनका होना या न होना देवाधीन है। अतः जड़ आदि से पितृसृष्टि ही सन्तान पैदा हो यह नियम नहीं है।
यह कहना भी उचित नहीं है कि इंद्रियों के रहते आत्मा, ज्ञाता है और इंद्रियों के बिना अज्ञ। क्योंकि आत्मा, कभी