भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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पुनर्वसु आत्रेय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत

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पर अवलंबित है'। यह प्रश्नोत्तर 'तंत्रभाषा' में हुआ है क्योंकि आयुर्वेद, केवल 'मंत्र' अर्थात् विचार करने के लिये ही प्रस्तुत नहीं हुआ बल्कि 'तंत्र' अर्थात् कुछ करने के लिये प्रवृत्त हुआ है। इसके द्वारा आयु को जाना भी जाता है आर आयु की रक्षा भी की जाती है। रक्षाविधान में अर्थात् तंत्र में सन्निष्ठ कारण ही अधिक महत्व पूर्ण होता है। पुरुषोत्पत्ति में अन्न, सन्निष्ठ भी है। सारांश तंत्र दृष्ट्या आहार को अभिवर्धक कहना उचित है। प्रसंगानुसार माता, पिता, आत्मा, सात्त्व्य, रस, सत्व, इनके समुदाय को भी पुरुषोत्पादक कहा ही गया है किन्तु त्रिभागात्मक सिद्धांत की दृष्टि से इनकी सबकी तह में आत्मा, त्रिगुण और त्रिधातु ही विद्यमान हैं।

मुश्रुत संहिता के गर्भोवक्रांति प्रकरण में प्राणों का उल्लेख किया जाना यह सूचित करता है कि धान्वंतर संप्रदायी

१ द्रव्य प्रधानतावादी, आहार को 'रसगुणाश्रयीभूत द्रव्य' कहते थे और धर्मप्रधानतावादी, आहारद्रव्य को तदगुणमूलक मानते थे। (देखो पृष्ठ ४५ व ४६) पुनर्वसु आत्रेय का कथन था कि यद्यपि मंत्र दृष्ट्या द्रव्यगत गुण, द्रव्य के मूलघटक और उत्पादक हैं तथापि तंत्र में तंत्र की भाषा का व्यवहार करना ही उचित है। धातु पोषण का विषय तंत्र से धानष्ट संबंध रखता है और तंत्र में आहार द्रव्य को अथवा द्रव्यमात्र को प्रधान तथा रसगुणाश्रय माना जाता है।