भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

होकर शरीर को धारण करता है। इस कथन के अनुसार प्राण का प्रसंदन, उदान का उदहरन, न्यान का पूर्ण, समान का विवेक और अपान का धारण मुख्य लक्षण हैं।

अत्र प्राणादिको कर् अलग २ विवेचन करते हैं। जैसा कि:—

वायुयों वक्त्र संचारी स प्राणो नाम देहधृक् ।

सोऽत्र प्रवेशयत्तंतः प्राणांश्चाप्यवलंबते ॥

प्रायशः कुरुते दुष्टो दिकाश्चासादिकान् गदान् ।

अर्थात् जो वायु नाक व मुख से शरीर में प्रविष्ट होता है उस को प्राण कहते हैं। यह देह को धारण करता है, अत्र को भीतर प्रविष्ट करता है और प्राणों का अवलंबन करता है। दूषित होने पर यह दिकाश्वास आदि रोगों को पैदा करता है।

बाहर की हवा नाक व मुख के द्वारा मुख्यतः प्राणवहलोटों (श्वास मार्ग, Trachae अपस्तंभ, Bronchi लघ्वपस्तंभ, Bronchioli वातवह लोत, Air Passages वायु कोष, Air Sacs और ऊपमुखीया भमनी Pulmonary Artery) में प्रविष्ट होता है। इस हवा में प्राण द्रव्य रहता है। यह प्राणद्रव्य, रक्त के द्वारा प्रथम हृदय में और वहां से समस्त शरीर में संचार करता है। यह शरीर धातुओं का पोषक ही नहीं बल्कि जीवन की मुख्य वस्तु होने के कारण इसको देहधारक कहना यथार्थ ही है। अत्र को निगलने के समय बाहर की हवा को अन्नमार्ग में लेने की आवश्यकता रहती है। इनका कथन है कि हृदयस्थ प्राणों का अवलंबन यह प्राणद्रव्य ही करता है।