आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट
१७७
चैधाकर्ता । इस तरह यहां न्यान शब्द वर्ग बोधक ही है ।
पक्षाधानाल्योऽपानः काले कर्षति चाप्ययम् ॥
समीरणः शकृन्मूत्रगर्भशुक्रार्तव्यान्यधः ।
कुड्रस्तु कुहते रोगान् घोरान् बस्तिगुदाश्रयान् ॥
( सु. नि. अ० १ )
यहां पक्षाधान शब्द से महास्रोत का उंडुक से अघरगुद तक का भाग, मूत्र संस्था, शुक्रार्तवोत्पादक यंत्र और गर्भाशय इनको सबको ग्रहण करना चाहिये । अत्रत्य वायु (प्राण और कटुप्रपाकजन्य) को अपान कहते हैं । यह पुरीष, मूत्र, शुक्र, आर्तव और गर्भ को धारण करता है और यथा समय इनको बाहर भी निकालता है । कुपित अवस्था में यह बस्तिगुदाश्रित रोगों को पैदा करता है ।
अपान शब्द भी यहां वर्ग बोधक है । तदनुसार भिन्न २ स्थानों में भिन्न २ पदार्थों को धारण करने की व उनको बाहर निकालने की उसकी पद्धति भी भिन्न २ है :
वायु धर्म के प्रकारः—इन पर विचार करने के पहिले धातुप्रसाद जन्य स्पर्शनेन्द्रिय की रचना को जानना आवश्यक है । किंतु उपलब्ध आयुर्वेदिक संहिताओं में इसकी रचना का विवेचन नहीं के बराबर है ।
अन्य आर्ष ग्रंथों में इसकी स्थूल रचना का कुछ विवेचन उपलब्ध होता है । उसमें मस्तिष्कगत ‘सहस्रदलकमल’ ( सुश्रुत
१ ऊर्ध्वमूलेऽवाक्शाख एषाऽश्वत्यः सनातनः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवास्मृतमस्तुते ॥ ( कठ २।६।१ ) ‘ शतैवैका हृदयस्य नाज्यस्तासां