भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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परिशिष्ट

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किं सत्त्व की दृष्टियाँ प्रधानता से रहती हैं। फिर भी वायोविद्, प्राण को हर्ष (सत्त्वद्वत्प्रादक उद्योजन) की योनि (हर्षोत्साहयौनिः) मानते ही हैं।

प्राण, का यह विवेचन बहुत व्यापक है। प्राण के इस व्यापक क्षेत्र को संकुचित करके ही उदान आदि प्रभेदों की कल्पना की गई है। तदनुसार उदान के तीन कार्य हैं; (१) समस्त शारीर धातुओं का व्यूह करना, (२) अवयवों का सन्धान करना, और (३) वाणी को प्रवृत्त करना। (१) अग्नि को प्रज्वलित करना, (२) शरप्राण का शोषण करना और (३) बाँहमलों को अर्थात् किट्ठको अलग करना ये तीन कार्य समान के बतलाये हैं। वायोविद् के वक्तव्य में व्यान के कार्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। गर्भावस्था में कल्लपाक के समय छोटे बड़े खोटों को बनाना और गर्भ में आकृति पैदा करना अपान का कार्य है।

वायोविद् का यह प्राणादि विवेचन यजःपुराण परिसूद् के समय का है।

इसके अतिरिक्त चरक संहिता के वातव्याधि विकृत्सा में भी प्राणादि प्रकारों का विवेचन उपलब्ध होता है। मालूम नहीं कि यह विवेचन किसने किया और कब किया। वह इस प्रकार है:—

स्थानं प्राणस्य शीघोरः कर्णजिन्नाक्षिनासिकाः । श्वीवनक्ष्वथूद्धारः श्वासाहारादि कर्म च ॥

इसमें समस्त अभिवाहक वेगों का और कुछ प्रवर्तक वेगों का प्राण के कार्य क्षेत्र में समावेश किया गया है। चारम्भ ने भी अपने 'बुद्धिद्वयौद्रीयचित्तयूक्' इस विधान में अभिवाहक वेगों का और