आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२
आयुर्वेदिक दर्शन
और ऋदक दोनों मिश्र रहते हैं। और इस मिश्रण को ही 'जाठरस'। Gastric juice कहते हैं। जाठरस, अम्लकल्प और जंतुह्र है। पाचकसत्व में 'पौष्टिक' द्रव्यों के पाचन का धर्म है। इससे इक्षुशर्करा का फलशर्करा में या द्राक्षाशर्करा में परिवर्तन होता है। जाठरस से कुछ अंश में वसा का प्रयुक्करण होता है, दूध का दही बनता है और पिष्ट का पिष्टसत्व बनकर उससे पौष्टीशर्करा बनती है। किंतु इसका प्रधान कार्य पौष्टिक द्रव्यों का पाचन ही है।
(३) याकृत पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त प्रकार से याकृत जीवाणुओं से पैदा होता है। यह पीला, हल्का पीला हल्का लाल, या हल्का हरा रहता है। इसका गंध, कस्तुरी मायल और रस, मधुर तिक्त व अनुक्षार होता है। इसमें सैघवलवण, शारीर मद्य, वसा, ऋदक कफ, रंजक पित्त और कुछ खनिजक्षार मिश्र रहते हैं। वसा के पाचन में यह क्लोम पाचकपित्त का सहायक है। इससे पौष्टिक अन्न का पिंडीभवन (पिंडितम्) होता है। यह कुछ अंश में सारक भी है। इसमें विशेषता यह है कि यह अन्न के साथ पकाशय में से होता हुआ 'अन्नरसवहा' शिराओं में और वहां से वापिस यकृत में चला जाता है। मल के साथ कुछ बाहर भी निकलता है।
(४) क्लोम पाचकपित्तः—यह पूर्वोक्त तरीके से क्लोम में पैदा होता है। इसमें चार प्रकार के अभिपूत (अष्ट हेतु) रहते हैं। पोषकपाचक, पिष्टपाचक, वसापाचक और दधुत्पादक। अम्लकल्प पौष्टिक द्रव्य के पाचन में जिस तरह पाचकसत्व अधिक सफल होता है उस तरह क्षारकल्प पोषकद्रव्य के पाचन में 'पोषकपाचक' अधिक सफल होता है। अत्रत्य पिष्टपाचक से पिष्टपदार्थों का पौष्टी-