भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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परिशिष्ट

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है। मनुष्य के पित्त में श्वाव की अपेक्षा रक्तरंजक अधिक रहता है। किंतु स्त्री में इनके मिश्र प्रकार ही पाये जाते हैं। जैसाकिः—

लोहित रंजक पित्तः—इसमें लोह रहने के कारण इसको 'लोहित' कहा है। इसके दो प्रकार उपलब्ध हैं; (१) 'समित्र' और (२) 'अस्मित्र' अथवा 'अमित्र'। पहिला प्रकार धमनी गत रक्त में रहता है। दूसरा प्रकार शिरागत रक्त में अथवा जब रक्त को मित्र वायु प्राप्त नहीं होता तब समस्त रक्त में रहता है। मित्रवायु को शोषित करने का इसमें धर्म है। एक रक्ती लोहितरंजकपित्त, एक मांसा मित्रवायु को शोषित करता है। इस अवस्था में रक्त का रंग बिलकुल लाल रहता है। किंतु इसमें मित्रवायु की मात्रा जितनी कम रहती है उतनी ही उसमें श्वावता रहती है। आयुर्वेद में रक्त के 'जीवरक्त' और 'श्वावरक्त' दो प्रकार माने जाते हैं। मित्रवायु का कुछ अंश शिरागत अथवा श्वावरक्त में भी रहता है। कुछ विकृतियों में लोहित रंजक पित्त के साथ मित्रवायु का इतना घनिष्ठ संबंध होता है कि वह आसानी से अलग नहीं होता।

यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि शुष्करक्त से (अर्थात् ही लोहितरंजक पित्त से) जो लोहरहित रंजकपित्त अलग किया जाता है वह यकृतस्थ 'रक्तरंजकपित्त' के बिलकुल सदृश है। दोनों की पैदाइश एक ही जगह से होती है और रासायनिक परीक्षा द्वारा दोनों में सरीखे द्रव्य पाये जाते हैं। लोहितरंजकपित्त के विघटन या न्यूनता से (आयुर्वेदानुसार प्रकोप से) पांडु, कामला, हर्लमक इ. रोग पैदा होते हैं। यकृत में लोहित रंजक पित्त रहता है और उससे उक्त रक्त-रंजक और श्वाव रंजक दोनों का प्रथकरण होता है। शेष लोह याकृत जीवाणुओं में संचित किया जाता है।